अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने और किसी ठोस समझौते तक पहुंचने की कोशिशों के बीच एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ सीधा संपर्क साधने के लिए एक गुप्त बैकचैनल का इस्तेमाल किया था। इस गोपनीय मिशन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान की ओर से जो लोग बातचीत की मेज पर बैठे हैं, क्या उनके पास वास्तव में फैसले लेने का अधिकार है या नहीं।
नेचिरवान बरजानी की महत्वपूर्ण भूमिका
इस गुप्त संपर्क को स्थापित करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवान बरजानी को एक सेतु के रूप में चुना। बरजानी की पसंद के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे और उनके पास अमेरिका और ईरान, दोनों ही देशों का गहरा भरोसा है। इसके अलावा, तेहरान के शीर्ष अधिकारियों के साथ उनके पुराने और व्यक्तिगत संबंध हैं। बरजानी ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान में समय बिताया था और उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा पूरी की है। फारसी भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ ने उन्हें इस संवेदनशील बातचीत के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति बना दिया।
ईरानी वार्ताकारों पर संदेह और अमेरिका की रणनीति
मई के मध्य में अमेरिकी वार्ताकारों को यह संदेह होने लगा था कि ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची जिस समझौते पर चर्चा कर रहे हैं, क्या उसे IRGC का समर्थन प्राप्त है। अमेरिका को लगा कि असली ताकत IRGC के पास है और उनसे सीधे बात किए बिना कोई भी समझौता टिकाऊ नहीं होगा। इसी उद्देश्य से तत्कालीन अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गैबर्ड ने बरजानी से संपर्क किया। बताया जाता है कि यह कॉल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पूरी मंजूरी के साथ की गई थी।
गुप्त बातचीत का घटनाक्रम
बातचीत का सिलसिला मई की शुरुआत में शुरू हुआ। गैबर्ड ने बरजानी से यह जानने का अनुरोध किया कि क्या IRGC भी उसी समझौते के पक्ष में है जिस पर गालिबाफ और अराघची बात कर रहे हैं। बरजानी ने इसके बाद अपने संपर्कों का उपयोग किया और सीधे जनरल अहमद वाहिदी से बात करने की इच्छा जताई और 14 मई को एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब IRGC का एक अधिकारी एरबिल में बरजानी के कार्यालय पहुंचा। वहां एक एन्क्रिप्टेड फोन के माध्यम से बरजानी और जनरल वाहिदी के बीच सुरक्षित बातचीत कराई गई।
IRGC का रुख और प्रस्तावित बैठक
इस बातचीत के दौरान जनरल वाहिदी ने कथित तौर पर स्पष्ट किया कि वह और IRGC बातचीत की प्रक्रिया का पूरा समर्थन करते हैं और वे भी संकट का समाधान संवाद के जरिए ही चाहते हैं। बरजानी ने यह सकारात्मक संदेश तुरंत तुलसी गैबर्ड तक पहुंचाया। इसके बाद अमेरिका ने एरबिल में दोनों पक्षों के अधिकारियों के बीच एक गुप्त बैठक का प्रस्ताव रखा। हालांकि, यह बैठक सुरक्षा कारणों से सफल नहीं हो सकी। ईरानी पक्ष को यह डर था कि इराकी कुर्दिस्तान में इजरायली खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क बहुत मजबूत है, जिससे उनके अधिकारियों की सुरक्षा को खतरा हो सकता था।
ईरान में सत्ता का बदलता स्वरूप
यह पूरा घटनाक्रम ईरान के भीतर चल रही सत्ता की खींचतान को भी दर्शाता है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के निधन और उसके बाद 40 दिनों तक चले युद्ध ने IRGC की स्थिति को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है। नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की शुरुआती हफ्तों में कम सक्रियता ने भी अनिश्चितता को बढ़ाया है। वर्तमान में पाकिस्तान और कतर जैसे देश मध्यस्थता कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। इस बीच, नेचिरवान बरजानी ने एक बार फिर व्हाइट हाउस को अपनी मदद की पेशकश की है, जो भविष्य की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
