यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने की कोशिशों के बीच डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्लेषक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या अमेरिका फिर से अपनी उसी पुरानी रणनीति पर लौट रहा है, जिसमें उसने पहले अपनी आर्थिक ताकत को चरम पर पहुंचाया और फिर सबसे निर्णायक वक्त पर युद्ध के मैदान में उतरा और हथियारों के कारोबार से लेकर युद्ध में अंतिम समय पर एंट्री करने की यह नीति ट्रंप के शांति प्रयासों के पीछे का असली आधार मानी जा रही है।
शांति नीति और आक्रामक रुख का विरोधाभास
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को युद्धविरोधी यानी एंटी वॉर नेता के रूप में पेश करते रहे हैं। यही कारण है कि वे यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए हर संभव कूटनीतिक और राजनीतिक हथकंडे आजमाते नजर आते हैं और हालांकि, पश्चिम एशिया के मामले में ट्रंप का रुख काफी आक्रामक रहा है, खासकर ईरान को लेकर। इसके साथ ही, वे समय-समय पर पनामा नहर और डेनमार्क से ग्रीनलैंड छीनने जैसी धमकियां भी देते रहे हैं। ट्रंप की इस दोहरी नीति ने वैश्विक राजनीति में कई तरह के संदेह पैदा कर दिए हैं।
यूरोपीय सहयोगियों का बढ़ता संदेह
ट्रंप की नीयत पर यूरोपीय संघ और नैटो के सहयोगी देशों को गहरा शक है और सवाल यह उठ रहा है कि क्या ट्रंप अपने पुराने सहयोगियों की अनदेखी कर रहे हैं, जबकि यह स्पष्ट है कि यूरोपीय संघ को साथ लिए बिना यूक्रेन युद्ध का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। ट्रंप द्वारा नैटो और यूरोपीय देशों से दूरी बनाना उनकी एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा प्रतीत होता है।
पुतिन से संवाद और शांति दूत की भूमिका
जब डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति बनने के लिए चुनाव मैदान में कदम रखा, तब तक यूक्रेन पूरी तरह से जंग का मैदान बन चुका था। रूसी हमले के महज दो हफ्ते बाद ही ट्रंप ने खुद को एक शांति दूत के रूप में अमेरिकी जनता के सामने पेश करना शुरू कर दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने यूक्रेन युद्ध को जो बाइडेन की सबसे बड़ी विफलता बताया और दुनिया को चेतावनी दी कि तीसरा विश्व युद्ध करीब है, जिसे केवल वे ही रोक सकते हैं।
नैटो पर फोड़ा युद्ध का ठीकरा
राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी ट्रंप ने यह स्पष्ट किया कि वे किसी भी नए युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। उनके लिए अमेरिका को महाशक्ति बनाने का सबसे बड़ा हथियार कारोबार और अर्थव्यवस्था है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ युद्धविराम पर बातचीत करने के महज 24 घंटे बाद, ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान ट्रंप के दो बयान बेहद महत्वपूर्ण थे।
ट्रंप ने सीधे तौर पर यूक्रेन युद्ध के लिए नैटो को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि रूस ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उसे यूक्रेन में नैटो की मौजूदगी मंजूर नहीं है। वहीं, बांग्लादेश के मुद्दे पर पूछे गए सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश का मामला प्रधानमंत्री मोदी देखेंगे और इन बयानों से यह साफ हो गया कि ट्रंप यूक्रेन युद्ध में नैटो के माध्यम से अमेरिका की सीधी भागीदारी को एक रणनीतिक गलती मानते हैं और वे फिलहाल अमेरिका को आर्थिक रूप से सर्वशक्तिमान बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।
मेक अमेरिका ग्रेट अगेन और ऐतिहासिक संदर्भ
ट्रंप की नजर में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का अर्थ उस दौर के अमेरिका से है, जो प्रथम विश्व युद्ध से पहले केवल अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाने में जुटा था। इस राष्ट्रवाद को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के तीन साल बाद तक अमेरिका ने खुद को इस महायुद्ध से पूरी तरह अलग रखा था। उस समय अमेरिका तटस्थ था, लेकिन पर्दे के पीछे वह अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति बढ़ा रहा था।
जब राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने अमेरिकी संसद से युद्ध में उतरने की अनुमति मांगी, तो उन्होंने जर्मनी द्वारा अमेरिकी मालवाहक जहाजों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया और शुरुआती तीन वर्षों में अमेरिका ने फ्रांस और ब्रिटेन को बड़े पैमाने पर हथियार बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया था। जब युद्ध अपने अंतिम और निर्णायक दौर में पहुंचा, तब अमेरिका अपनी पूरी सैन्य ताकत के साथ मैदान में उतरा।
लोकतंत्र का शस्त्रागार और द्वितीय विश्व युद्ध
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने इसी सफल प्रयोग को दोहराया और दो साल तक अमेरिका ने यूरोप और पूर्वी एशिया की जंग से दूरी बनाए रखी। इस दौरान नाजी जर्मनी से लड़ने के लिए फ्रांस और ब्रिटेन की सेनाएं अमेरिकी हथियारों पर ही निर्भर थीं। तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने अमेरिका को 'आर्सेनल ऑफ डेमोक्रेसी' यानी लोकतंत्र के हथियारों का गोदाम कहा था।
दिसंबर 1941 में पर्ल हार्बर पर जापान के हमले के बाद अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर युद्ध का ऐलान किया। उस समय तक अमेरिका का परमाणु बम बनाने का 'मैनहटन प्रोजेक्ट' काफी उन्नत चरण में पहुंच चुका था। अमेरिका के युद्ध में शामिल होते ही पूरी जंग की तस्वीर बदल गई।
देर से युद्ध में उतरने का रणनीतिक लाभ
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में देरी से शामिल होने का अमेरिका को जबरदस्त रणनीतिक फायदा मिला। वह युद्ध की शुरुआती तबाही से बचा रहा और उसकी सेना के पास दुश्मन की ताकत और कमजोरियों का पूरा डेटा मौजूद था। अमेरिकी फौज अन्य देशों की सेनाओं की तरह थकी हुई नहीं थी। अमेरिका के सक्रिय होते ही युद्ध समाप्त हो गए, जिससे पूरी दुनिया ने अमेरिका को एकमात्र महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया। ट्रंप की वर्तमान नीतियां इसी पुराने अमेरिकी मॉडल की याद दिलाती हैं।
