मिडिल ईस्ट में एक बार फिर से भू-राजनीतिक हलचल तेज हो गई है, और इसकी धुरी पर ईरान का 'काला खजाना' यानी तेल है. वैश्विक कूटनीति के गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या यह सिर्फ एक पुराना राजनीतिक टकराव है, या इसके पीछे कोई गहरी आर्थिक रणनीति छिपी है? कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, यदि वे सत्ता में लौटते हैं, तो ईरान के साथ वही फॉर्मूला अपनाना चाहते हैं जो उन्होंने दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में सफलतापूर्वक आजमाया था. यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव युद्ध का रूप लेता है, तो इसके पीछे 'लोकतंत्र' या 'परमाणु सुरक्षा' के बजाय 'ब्लैक गोल्ड' यानी तेल की असीमित भूख सबसे बड़ी वजह हो सकती है. यह एक ऐसा खेल है जिसकी परतें दुनिया के सामने धीरे-धीरे खुल रही हैं, और इसके वैश्विक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं.
ट्रंप और ईरान: एक पुराना और कड़वा रिश्ता
डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच रिश्तों में कड़वाहट कोई नई बात नहीं है और अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) के दौरान, ट्रंप ने ओबामा प्रशासन द्वारा की गई न्यूक्लियर डील को रद्द कर दिया था, जिससे यह स्पष्ट हो गया था कि वे ईरान को किसी भी कीमत पर बख्शने के मूड में नहीं हैं. उस समय उनकी कठोर नीतियों के कारण ईरान का तेल निर्यात 80% तक गिर गया था, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा था. अब, 2025 में, यह दबाव और भी खतरनाक और तीव्र. हो गया है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है.
इजरायल-ईरान संघर्ष और आंतरिक अशांति
बीते जून 2025 में इजरायल और ईरान के बीच हुई 12. दिनों की जंग ने हालात को और भी नाजुक बना दिया है. इस संघर्ष में अमेरिका ने खुलकर इजरायल का साथ दिया, जिसके परिणामस्वरूप. ईरान की शक्तिशाली 'इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) को भारी नुकसान पहुंचा. इसके बाद, जनवरी 2026 में, ईरान के भीतर ही गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं. महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त ईरानी जनता सड़कों पर उतर आई है और बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन कर रही है. ट्रंप इन प्रदर्शनकारियों को समर्थन देकर मौजूदा ईरानी सरकार की नींव हिलाने की कोशिश कर रहे हैं. जानकारों का मानना है कि यह समर्थन केवल हमदर्दी नहीं है, बल्कि ईरान को भीतर से खोखला करने और उसकी राजनीतिक स्थिरता को कमजोर करने की एक सोची-समझी चाल है, ताकि बाहरी हस्तक्षेप के लिए जमीन तैयार की जा सके.
वेनेजुएला मॉडल: तेल पर कब्जे का ब्लूप्रिंट
ईरान के साथ भविष्य में क्या हो सकता है, इसे समझने के. लिए हमें दक्षिण अमेरिका के देश वेनेजुएला के घटनाक्रम पर गौर करना होगा. ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला को एक 'टेस्ट केस' के रूप में इस्तेमाल किया था. जनवरी 2026 की शुरुआत में, अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करवाया. उन पर ड्रग ट्रैफिकिंग और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, लेकिन भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं. कि असली मकसद वेनेजुएला के पास मौजूद दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर कब्जा करना था.
मादुरो को सत्ता से हटाने के बाद, अमेरिका ने वहां अपनी पसंद की सरकार को समर्थन दिया. इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि अब शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल जैसी अमेरिकी दिग्गज तेल कंपनियां वेनेजुएला के तेल कुओं पर काम कर रही हैं. ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” का नारा यहां स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, क्योंकि वेनेजुएला का तेल अब अमेरिकी रिफाइनरियों की प्यास बुझा रहा है, जिससे इस क्षेत्र में रूस और चीन का प्रभाव लगभग खत्म हो गया है. अब यही स्क्रिप्ट ईरान के लिए भी लिखी जा रही है. ईरान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसका निर्यात काफी सिमट कर रह गया है. ट्रंप की नजर इसी विशाल तेल भंडार पर है, ताकि वे वैश्विक तेल बाजार को नियंत्रित कर सकें और अमेरिकी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकें.
ईरान के तेल का चीन से गहरा संबंध
इस पूरी रणनीति का एक महत्वपूर्ण सिरा बीजिंग से भी जुड़ता है. ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. ट्रंप अच्छी तरह जानते हैं कि अगर ईरान की तेल आपूर्ति लाइन काट दी गई, तो चीन की अर्थव्यवस्था अपने आप घुटनों पर आ जाएगी, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरानी तेल पर काफी हद तक निर्भर है. इसे अंजाम देने के लिए, ट्रंप प्रशासन 'मैक्सिमम प्रेशर 2. 0' नामक एक रणनीति के तहत कई कड़े कदम उठा रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान को आर्थिक रूप से पंगु बनाना और चीन को कमजोर करना है.
मैक्सिमम प्रेशर 2.
इस रणनीति के तहत कई कठोर उपाय शामिल हैं. पहला, भारी टैरिफ लगाए गए हैं. जो भी देश, विशेषकर चीन, ईरान से तेल खरीदेगा, उस पर 25% का भारी टैरिफ लगाया गया है. इससे चीन के लिए ईरानी तेल खरीदना अब आर्थिक रूप से फायदे का सौदा नहीं रहा, जिससे वह अन्य स्रोतों की ओर मुड़ने पर मजबूर होगा और दूसरा, समुद्री नाकेबंदी को मजबूत किया गया है. ईरान अपनी 'शैडो फ्लीट' (गुप्त जहाजों) के जरिए चोरी-छिपे तेल बेचता रहा है. अमेरिकी नौसेना ने अब खाड़ी में अपनी गश्त बढ़ा दी है और इन जहाजों को जब्त करने या नष्ट करने की धमकी दी है, जिससे ईरान के अवैध तेल व्यापार पर लगाम लगाई जा सके. तीसरा, साइबर वॉर का खतरा मंडरा रहा है. ईरान के परमाणु ठिकानों और मिसाइल प्रोग्राम पर साइबर हमलों का खतरा बढ़ गया है, ताकि उनका ध्यान बंटा रहे और वे अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत न कर सकें. ईरान की अर्थव्यवस्था का लगभग 70% हिस्सा तेल राजस्व पर टिका है. ट्रंप प्रशासन का गणित सीधा है: यदि आमदनी का मुख्य जरिया बंद कर दिया जाए, तो सरकार या तो. अपने आप गिर जाएगी या फिर घुटने टेक कर अमेरिका की शर्तों पर डील करने को मजबूर हो जाएगी.
क्या एक और युद्ध अवश्यंभावी है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम एक और खाड़ी युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं? ट्रंप अपनी रैलियों में खुद को 'शांतिदूत' बताते हों, लेकिन उनके कदम युद्ध की आहट दे रहे हैं. हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका सीधे तौर पर ईरान पर हमला करने से बचेगा और ईरान की सेना मजबूत है और एक सीधा युद्ध अमेरिका को आर्थिक रूप से बहुत भारी पड़ सकता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. इसके अलावा, अगर युद्ध छिड़ा तो हॉर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) बंद हो सकता है, जो वैश्विक तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है और इससे कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए महंगाई एक बड़ी मुसीबत बन जाएगी.
ट्रंप का असली खेल 'रेजीम चेंज' या फिर एक ऐसी सख्त डील है, जो ईरान के परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम को पूरी तरह खत्म कर दे. वे चाहते हैं कि ईरान का तेल अमेरिकी कंपनियों या उनके मित्र देशों के पास जाए, न कि चीन के पास. लेकिन खतरा यह है कि अगर ईरान ने दबाव में आकर अमेरिकी बेस पर हमला कर दिया, तो फिर हालात किसी के भी काबू में नहीं रहेंगे. हूती विद्रोही और हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स पहले ही सक्रिय हो चुके हैं, जो क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकते हैं. फिलहाल, दुनिया सांस थामे ट्रंप के अगले कदम का इंतजार कर रही है, क्योंकि एक छोटी सी चिंगारी पूरे मिडिल ईस्ट को आग के हवाले कर सकती है, जिसके परिणाम विनाशकारी होंगे.