खामेनेई की मौत: ट्रंप पर अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघन के आरोप

28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद कानूनी बहस छिड़ गई है। आलोचकों का दावा है कि यह कार्रवाई अमेरिकी कार्यकारी आदेश 12333 और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, क्योंकि इसके लिए कांग्रेस या संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी नहीं ली गई थी।

28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा शुरू किए गए एक संयुक्त सैन्य हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु हो गई। यह घटना केवल एक सैन्य अभियान तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय और संवैधानिक कानूनी विवाद को जन्म दे दिया है। कानूनी विशेषज्ञों और आलोचकों का तर्क है कि इस हमले को अंजाम देने से पहले न तो अमेरिकी कांग्रेस से अनुमति ली गई और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कोई औपचारिक मंजूरी प्राप्त की गई थी। इस कार्रवाई ने अमेरिका के भीतर और वैश्विक स्तर पर संप्रभुता और युद्ध के नियमों पर नई बहस छेड़ दी है।

कार्यकारी आदेश 12333 और हत्या पर प्रतिबंध

इस विवाद के केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यकारी आदेश 12333 (Executive Order 12333) है। इस आदेश की जड़ें 1970 के दशक में चर्च कमेटी की जांच से जुड़ी हैं, जिसमें यह खुलासा हुआ था कि सीआईए (CIA) शीत युद्ध के दौरान विदेशी नेताओं की हत्या की साजिशों में शामिल थी। इसके जवाब में 1979 में तत्कालीन राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने एक आदेश जारी किया था, जिसे बाद में कार्यकारी आदेश 12333 के रूप में संहिताबद्ध किया गया। यह आदेश स्पष्ट रूप से अमेरिकी सरकार के किसी भी कर्मचारी या एजेंसी को राजनीतिक हत्याओं में शामिल होने या ऐसी साजिश रचने से प्रतिबंधित करता है। कानूनी जानकारों के अनुसार, खामेनेई को निशाना बनाना इस ऐतिहासिक आदेश का सीधा उल्लंघन हो सकता है।

खुफिया जानकारी साझा करने में अमेरिका की भूमिका

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सीआईए लंबे समय से खामेनेई की गतिविधियों और उनके सटीक स्थान की निगरानी कर रही थी। कथित तौर पर यह खुफिया जानकारी इजराइल के साथ साझा की गई, जिसके आधार पर इजराइली वायुसेना ने हमला किया। अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका ने सीधे तौर पर हमला नहीं भी किया, तो भी सटीक लोकेशन और खुफिया सहायता प्रदान करना उसे इस कार्रवाई में बराबर का भागीदार बनाता है। यह भागीदारी कार्यकारी आदेश 12333 के तहत 'साजिश में शामिल न होने' के नियम को चुनौती देती है।

सैन्य कमांडर बनाम नागरिक की कानूनी स्थिति

खामेनेई की कानूनी स्थिति को लेकर भी विशेषज्ञों में मतभेद हैं। हमले के समय वे सैन्य वर्दी में नहीं थे, जिससे तकनीकी रूप से उन्हें एक नागरिक माना जा सकता है। हालांकि, वे ईरान की सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भी थे और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत, युद्ध के दौरान किसी सैन्य कमांडर को निशाना बनाना वैध माना जाता है। लेकिन इस मामले में पेंच यह है कि जिस हमले में खामेनेई मारे गए, वही हमला इस संघर्ष की शुरुआत थी। विशेषज्ञों के अनुसार, शांति काल में किसी विदेशी नेता की हत्या करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध है, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वह व्यक्ति अमेरिका पर तत्काल हमला करने वाला था।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर और आत्मरक्षा का दावा

डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई को 'कमांडर इन चीफ' के अधिकारों का प्रयोग बताते हुए इसे अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आवश्यक बताया है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा था और अमेरिकी ठिकानों के लिए खतरा बना हुआ था। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बल प्रयोग वर्जित है। कानूनी विशेषज्ञ रेबेका इंगबर के अनुसार, यदि मूल हमला ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन था, तो उसके तहत की गई किसी भी हत्या को कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता। आत्मरक्षा का दावा केवल तभी मान्य होता है जब हमला 'आसन्न' (Imminent) हो।

अमेरिकी संविधान और वॉर पावर्स एक्ट की चुनौतियां

घरेलू स्तर पर, अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 1 के तहत युद्ध घोषित करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। 1973 का वॉर पावर्स एक्ट राष्ट्रपतियों को बिना कांग्रेस की मंजूरी के बड़े सैन्य अभियान चलाने से रोकता है। ईरान के खिलाफ यह कार्रवाई हाल के दशकों में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई सबसे बड़ी एकतरफा सैन्य कार्रवाई मानी जा रही है। इससे पहले 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के समय भी इसी तरह के सवाल उठे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्यकारी आदेश 12333 का उल्लंघन साबित होता है, तो यह आपराधिक सजा के बजाय एक गंभीर संवैधानिक संकट और राजनीतिक जवाबदेही का मामला बन सकता है।