मध्य-पूर्व में जारी व्यापक सैन्य संघर्ष को रोकने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रस्ताव सामने आया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्ध विराम के लिए 15 अत्यंत सख्त शर्तें निर्धारित की गई हैं। यह प्रस्ताव एक ऐसे समय में आया है जब ईरान क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक दबाव के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, इन शर्तों की प्रकृति ने तेहरान के भीतर एक गंभीर रणनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।
ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच सबसे बड़ी चिंता 'लीबिया मॉडल' को लेकर है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, वर्ष 2003 में लीबिया के तत्कालीन नेता मुअम्मर गद्दाफी ने अमेरिका के साथ इसी तरह का समझौता कर अपना परमाणु कार्यक्रम त्याग दिया था। इसके बाद वर्ष 2011 में नाटो के हस्तक्षेप और आंतरिक विद्रोह के परिणामस्वरूप गद्दाफी की सत्ता का अंत हुआ और उनकी हत्या कर दी गई। ईरान को डर है कि इन शर्तों को स्वीकार करना उसके लिए रणनीतिक आत्मसमर्पण के समान हो सकता है, जिससे भविष्य में उसकी संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है।
अमेरिका द्वारा प्रस्तावित 15 प्रमुख शर्तें
अमेरिका के इस कूटनीतिक मसौदे में सबसे पहली शर्त एक महीने के पूर्ण सीज़फायर की रखी गई है। इसके अतिरिक्त, ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को लगभग पूरी तरह समाप्त करना होगा और यूरेनियम संवर्धन की सभी गतिविधियों पर तत्काल रोक लगानी होगी। प्रस्ताव के अनुसार, ईरान को अपनी समस्त परमाणु सामग्री अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सौंपनी होगी। इसके साथ ही, नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे प्रमुख परमाणु केंद्रों को नष्ट करने की मांग की गई है।
सैन्य और रणनीतिक मोर्चे पर, अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी 'प्रॉक्सी रणनीति' का त्याग करे। इसमें हमास, हिज़बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों के साथ सभी प्रकार के संबंधों को समाप्त करना और उन्हें दी जाने वाली फंडिंग व हथियारों की आपूर्ति को पूरी तरह रोकना शामिल है। इसके अलावा, ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के आवागमन के लिए पूरी तरह खुला रखने की गारंटी देनी होगी। मिसाइल कार्यक्रम पर भी भविष्य में सीमाएं निर्धारित करने और सैन्य क्षमता को केवल आत्मरक्षा तक सीमित करने की शर्त रखी गई है।
परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय निगरानी
प्रस्ताव में परमाणु सुरक्षा और पारदर्शिता पर विशेष जोर दिया गया है। अमेरिका की मांग है कि IAEA के निरीक्षकों को ईरान के भीतर किसी भी स्थान की जांच करने की पूर्ण और अबाधित स्वतंत्रता दी जाए। यह शर्त ईरान के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि वह अपने सैन्य प्रतिष्ठानों तक विदेशी पहुंच का विरोध करता रहा है। यदि ईरान इन शर्तों को मानता है, तो उसे भविष्य में परमाणु हथियार न बनाने की एक औपचारिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी गारंटी देनी होगी।
इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र जैसे नागरिक परमाणु परियोजनाओं में अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया है। साथ ही, 'स्नैपबैक' व्यवस्था, जिसके तहत उल्लंघन की स्थिति में प्रतिबंध स्वतः वापस लग जाते हैं, उसे भी समाप्त करने की बात कही गई है। यह आर्थिक पैकेज ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन के रूप में पेश किया गया है।
क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क और रणनीतिक प्रभाव
ईरान की क्षेत्रीय शक्ति का एक बड़ा हिस्सा उसके समर्थित समूहों (प्रॉक्सी) के नेटवर्क पर निर्भर करता है। अमेरिका की शर्तों के अनुसार, ईरान को इन समूहों से पूरी तरह दूरी बनानी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ईरान हमास, हिज़बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों का समर्थन बंद करता है, तो मध्य-पूर्व में उसका प्रभाव काफी कम हो जाएगा। यह न केवल ईरान की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव होगा, बल्कि इससे क्षेत्र का शक्ति संतुलन भी पूरी तरह बदल सकता है।
ईरान के भीतर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) जैसे शक्तिशाली सैन्य संगठन इन शर्तों का कड़ा विरोध कर सकते हैं। IRGC का मानना है कि प्रॉक्सी नेटवर्क ईरान की 'रक्षा की पहली पंक्ति' है। ऐसे में इन संबंधों को तोड़ना आंतरिक विद्रोह या सैन्य असंतोष का कारण बन सकता है, जो ईरान की आंतरिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
लीबिया का उदाहरण और सुरक्षा की चिंताएं
ईरान के रणनीतिकारों के लिए लीबिया का उदाहरण एक चेतावनी की तरह है। वर्ष 2003 में मुअम्मर गद्दाफी ने पश्चिम के साथ संबंधों को सुधारने के लिए अपने सामूहिक विनाश के हथियारों (WMD) के कार्यक्रम को छोड़ दिया था। हालांकि, आठ साल बाद ही पश्चिमी देशों के समर्थन से उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका गया। ईरान में यह धारणा प्रबल है कि परमाणु और मिसाइल क्षमता ही उसे बाहरी आक्रमण से बचाने वाली एकमात्र गारंटी है।
ईरान को इस बात का भी संदेह है कि यदि वह अपनी सैन्य और परमाणु शक्ति का त्याग कर देता है, तो भविष्य में इजराइल या अमेरिका किसी भी छोटे बहाने या समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाकर उस पर हमला कर सकते हैं। सुरक्षा की इस अनिश्चितता के कारण ईरान के लिए इन 15 शर्तों पर सहमति जताना एक अत्यंत कठिन निर्णय बन गया है।
आर्थिक राहत बनाम संप्रभुता का संकट
प्रस्ताव के आर्थिक पहलू ईरान के लिए आकर्षक हो सकते हैं। वर्षों से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरान की मुद्रा और तेल निर्यात को भारी नुकसान पहुंचाया है। अमेरिका द्वारा प्रतिबंध हटाने का वादा ईरान को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में वापस ला सकता है। इससे देश में मुद्रास्फीति कम होने और बुनियादी ढांचे के विकास की संभावना बढ़ेगी। नागरिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय मदद भी ईरान की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहायक हो सकती है।
हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि क्या आर्थिक लाभ के लिए ईरान अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक नीतियों और सैन्य शक्ति का बलिदान देगा। ईरान के सामने वर्तमान में दो स्पष्ट मार्ग हैं: पहला, शर्तों को मानकर आर्थिक स्थिरता और शांति की ओर बढ़ना, और दूसरा, अपनी सैन्य शक्ति को बनाए रखते हुए टकराव की स्थिति को जारी रखना। यह निर्णय न केवल ईरान के भविष्य को बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक दिशा को निर्धारित करेगा।
