पश्चिम बंगाल चुनाव: कोलकाता के चीनी समुदाय को साधने में जुटी TMC, मैंडरिन में प्रचार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) कोलकाता के चीनी समुदाय को लुभाने के लिए मैंडरिन भाषा का सहारा ले रही है। कभी 50 हजार की आबादी वाला यह समुदाय अब महज 3-4 हजार रह गया है, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक रूप से इनका महत्व बरकरार है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में राजनीतिक सरगर्मी तेज होते ही सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) कोलकाता में चीनी समुदाय को अपने पक्ष में करने के प्रयासों में जुट गई है। पार्टी इस समुदाय से उनकी अपनी भाषा, मैंडरिन में संपर्क साध रही है। टीएमसी के उम्मीदवार जावेद खान ने चाइनाटाउन के मतदाताओं तक पहुंचने के लिए टांगरा की दीवारों पर मैंडरिन भाषा में ग्रैफिटी (Graffiti) बनवाई है और इसी भाषा में समर्थन की अपील की है।

चीनी समुदाय का राजनीतिक और आर्थिक महत्व

जावेद खान के अनुसार, उनका चुनावी क्षेत्र एक ‘मिनी-इंडिया’ की तरह है, जहां विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोग निवास करते हैं। उन्होंने चीनी मतदाताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मैंडरिन भाषा में अपील करने का निर्णय लिया। हालांकि वर्तमान में इस समुदाय की संख्या कम हो गई है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ये फंडिंग के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में जाने जाते हैं, विशेषकर चुनाव के समय। टांगरा, जो 1920 के दशक में चमड़ा उद्योग का प्रमुख केंद्र था, अब चीनी व्यंजनों और रेस्टोरेंट्स के लिए प्रसिद्ध हो चुका है।

18वीं सदी से जुड़ी हैं समुदाय की जड़ें

कोलकाता में चीनी समुदाय का इतिहास 18वीं सदी के अंत से शुरू होता है। 1778 में टोंग आचू नामक व्यक्ति यहां आने वाले पहले चीनी नागरिकों में से एक थे। उन्होंने बज-बज के पास एक चीनी मिल की स्थापना की थी। आचू को 45 रुपये सालाना किराए पर 650 बीघा जमीन दी गई थी। स्थानीय लोग उन्हें 'आचू' पुकारते थे, जिसके कारण उस स्थान का नाम ‘आचीपुर’ पड़ गया। आचू की मृत्यु के बाद वहां रहने वाले लोग मध्य कोलकाता के तिरेटा बाजार चले गए। आज भी आचीपुर में आचू की कब्र और एक चीनी मंदिर मौजूद है।

1962 का युद्ध और आबादी में गिरावट के कारण

1960 के दशक में कोलकाता में चीनी लोगों की आबादी लगभग 50,000 थी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान इस समुदाय को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। कई लोगों को चीनी एजेंट होने के संदेह में राजस्थान के देओली कैंपों में हिरासत में लिया गया था। जब वे रिहा हुए, तो उनके घर और व्यवसाय नष्ट हो चुके थे, जिससे बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ। इसके अलावा, कई परिवारों ने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए विदेश भेज दिया है।

जनसंख्या और मतदाता सूची के आंकड़े

कोलकाता के तीन विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की मतदाता सूची की तुलना में 2026 की सूची से कम से कम 484 चीनी-भारतीयों के नाम हटा दिए गए हैं। इनमें से 80% का पता नहीं चल सका और शेष की मृत्यु हो चुकी है।

मतदान का व्यवहार और सामाजिक स्थिति

इंडियन चाइनीज एसोसिएशन के मुताबिक, यह समुदाय काफी स्वतंत्र है और आमतौर पर मदद के लिए सरकार के पास नहीं जाता। हालांकि, समुदाय के युवा राजनीतिक स्थितियों के प्रति अधिक जागरूक हैं और वे सक्रिय रूप से मतदान में हिस्सा लेते हैं। पुरानी चीनी बस्ती तिरेटा बाजार में रहने वाले लोग मुख्य रूप से फुजियान और गुआंगडोंग प्रांत से आए थे और ऐतिहासिक रूप से अफीम के व्यापार, चमड़े के कारखाने, लॉन्ड्री, रेशम कार्य, दंत चिकित्सा और ब्यूटी सैलून जैसे व्यवसायों से जुड़े रहे हैं।