BRICS से अमेरिका को क्यों लगता है डर? समझिए डॉलर और ट्रंप की चेतावनी का पूरा गणित

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को डॉलर के विकल्प की तलाश करने पर 100 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी दी है। ब्रिक्स के विस्तार और न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं के मजबूत होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रभुत्व को लेकर अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई हैं।

ब्रिक्स (BRICS) आज केवल उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की आवाज बनकर उभरा है। यही वह बदलाव है जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चिंतित नजर आ रहे हैं और ब्रिक्स को लेकर अमेरिका की यह चिंता लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के प्रभुत्व को मिलने वाली चुनौती और सदस्य देशों द्वारा वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था की तलाश है।

ट्रंप की चेतावनी और टैरिफ का डर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को लेकर कई बार कड़े तेवर दिखाए हैं और उन्हें टैरिफ की धमकी दी है। जनवरी 2025 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर को रिप्लेस करने या उसका विकल्प खोजने की कोशिश करते हैं, तो सदस्य देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। इसके बाद फरवरी 2025 में भी उन्होंने इसी तरह की चेतावनी दोहराई। जुलाई 2025 में ट्रंप ने अपने रुख को और कड़ा करते हुए कहा कि ब्रिक्स की कथित एंटी-अमेरिकन पॉलिसीज यानी अमेरिका विरोधी नीतियों के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। ये चेतावनियां दर्शाती हैं कि अमेरिका के लिए डॉलर का वैश्विक दबदबा कितना महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स का इतिहास और नामकरण

ब्रिक्स नाम पांच सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षरों को जोड़कर बनाया गया है। इसमें ब्राजील का B, रूस का R, इंडिया का I, चीन का C और साउथ अफ्रीका का S शामिल है। इन देशों के बीच सहयोग की औपचारिक शुरुआत 2006 में हुई थी। हालांकि, पहली ब्रिक (BRIC) लीडर्स समिट 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित की गई थी। उस समय इस समूह में केवल ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन शामिल थे। दक्षिण अफ्रीका इस समूह में बाद में जुड़ा और 2010 में इसके शामिल होने के बाद इसका नाम ब्रिक से बदलकर ब्रिक्स (BRICS) हो गया। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिक शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने एक रिसर्च पेपर में किया था, जिसमें उन्होंने इन तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की क्षमता को रेखांकित किया था।

ब्रिक्स के गठन का मुख्य उद्देश्य

ब्रिक्स को शुरुआत में किसी अमेरिका-विरोधी संगठन के रूप में नहीं बनाया गया था। इसका मूल उद्देश्य वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूती प्रदान करना था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक संस्थाएं जैसे विश्व बैंक और आईएमएफ (IMF) में विकासशील देशों का मानना रहा है कि उन्हें उनकी आर्थिक ताकत के अनुसार पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी स्थायी सदस्यता केवल पांच देशों तक सीमित है। ब्रिक्स देशों का तर्क है कि 21वीं सदी की वास्तविकताएं 1945 की दुनिया से अलग हैं, इसलिए वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए।

2008 की मंदी और ब्रिक्स की प्रासंगिकता

2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने ब्रिक्स की सोच को और अधिक मजबूती दी। उस समय अमेरिका और यूरोप को बड़ा आर्थिक झटका लगा था, जबकि भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं काफी हद तक स्थिर बनी रहीं। इससे इन देशों को जी20, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे मंचों पर अपनी बात ज्यादा मजबूती से रखने का मौका मिला। सरल शब्दों में कहें तो ब्रिक्स का उद्देश्य वैश्विक फैसलों में पश्चिमी देशों के साथ-साथ ग्लोबल साउथ (Global South) की भागीदारी को बढ़ाना था।

ब्रिक्स की कार्यप्रणाली और संरचना

ब्रिक्स की कोई औपचारिक सरकार, संसद या स्थायी मुख्यालय नहीं है और इसकी अध्यक्षता हर साल एक सदस्य देश के पास होती है, जो साल भर के एजेंडे और बैठकों का संचालन करता है। विभिन्न मुद्दों पर सदस्य देशों के मंत्रियों की बैठकें होती हैं और व्यापार, स्वास्थ्य, तकनीक और विज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए कार्य समूह बनाए जाते हैं और ब्रिक्स में बड़े फैसले आम तौर पर सभी देशों की सहमति से लिए जाते हैं। साल के अंत में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) इसका सबसे बड़ा मंच होता है और 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास होगी, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सहयोग के तीन प्रमुख स्तंभ

ब्रिक्स का कार्य मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में विभाजित है:

  • राजनीतिक और सुरक्षा: इसमें वैश्विक संघर्ष, आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।
  • आर्थिक और वित्तीय: इसमें व्यापार, निवेश, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया जाता है।
  • सांस्कृतिक और जन-संपर्क: इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और पर्यटन जैसे विषयों पर सहयोग किया जाता है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक और वित्तीय संस्थान

ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धियों में न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना शामिल है। इसे 2014 में स्थापित किया गया था और इसने 2015 में अपना काम शुरू किया। इसका मुख्यालय चीन के शंघाई में है। इसे विश्व बैंक के एक विकल्प के रूप में देखा जाता है, जो उभरते देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर और सतत विकास के प्रोजेक्ट्स के लिए फंड देता है। इसके अलावा, ब्रिक्स ने कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) भी बनाया है, जो किसी सदस्य देश के वित्तीय संकट में आने पर उसे नकदी (Liquidity) उपलब्ध कराने में मदद करता है।

ब्रिक्स का विस्तार और डॉलर की चुनौती

ब्रिक्स अब अपने मूल पांच देशों से आगे बढ़कर ब्रिक्स प्लस (BRICS Plus) बन चुका है। इसमें मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हुए हैं। इस विस्तार ने समूह के आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) को लेकर है। यदि देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने लगते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर का प्रभाव कम हो सकता है। यही कारण है कि ट्रंप की चेतावनियां डॉलर और अमेरिका के वैश्विक आर्थिक प्रभाव को बचाने की एक कोशिश के रूप में देखी जा रही हैं।