असम विधानसभा चुनाव: कांग्रेस में दलबदल का संकट, गौरव गोगोई संभालेंगे कमान

असम विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही कांग्रेस दलबदल की गंभीर समस्या से जूझ रही है। पार्टी 2016 से सत्ता से बाहर है और उसे भाजपा के मजबूत संगठन और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की नीतियों का सामना करना है। गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस वापसी की कोशिश कर रही है।

असम विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार का मुकाबला मुख्य रूप से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन और विपक्षी कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। हालांकि, चुनावी तैयारियों के बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर जारी दलबदल की प्रक्रिया ने पार्टी नेतृत्व की चिंताओं को बढ़ा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस को इस बार न केवल भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे का मुकाबला करना है, बल्कि अपने ही खेमे को एकजुट रखने की भी बड़ी चुनौती है।

असम में कांग्रेस पार्टी साल 2016 से सत्ता से बाहर है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इस बार पार्टी सांसद गौरव गोगोई के नेतृत्व में नए सिरे से जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है। गौरव गोगोई ने हाल ही में जोरहाट लोकसभा सीट से बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी, जिसके बाद पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में देख रही है। हालांकि, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का पलायन और वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना कांग्रेस के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है।

दलबदल और संगठनात्मक ढांचे पर संकट

पिछले एक दशक में असम कांग्रेस को कई बड़े झटके लगे हैं। इसकी शुरुआत 2015 में हुई थी जब वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी थी। हाल के दिनों में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कई मौजूदा विधायकों के भाजपा में शामिल होने से कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हुआ है। पार्टी के भीतर एकजुटता की कमी और जमीनी स्तर पर नेतृत्व का अभाव चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। अधिकारियों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि नेताओं के जाने से न केवल वोट बैंक प्रभावित होता है, बल्कि कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।

गौरव गोगोई की भूमिका और जोरहाट जीत का प्रभाव

कांग्रेस पार्टी के लिए गौरव गोगोई एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं और 2024 के लोकसभा चुनावों में जोरहाट सीट पर उनकी जीत को पार्टी की संजीवनी माना जा रहा है। भाजपा ने उस सीट पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन गोगोई ने बड़े अंतर से जीत हासिल की। पार्टी अब इसी मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने की योजना बना रही है। गौरव गोगोई की छवि एक युवा और प्रखर नेता की है, जो संसद से लेकर सड़क तक राज्य के मुद्दों को उठाते रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि गोगोई के नेतृत्व में युवा मतदाता और मध्यम वर्ग पार्टी की ओर आकर्षित होगा।

चाय बागान श्रमिकों और अल्पसंख्यक मतदाताओं का समीकरण

असम की राजनीति में चाय बागान श्रमिकों की भूमिका निर्णायक होती है और ऐतिहासिक रूप से यह वर्ग कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है, लेकिन 2014 के बाद से इस समीकरण में बड़ा बदलाव आया है। भाजपा ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस वर्ग में गहरी पैठ बनाई है। कांग्रेस के लिए इस खोए हुए जनाधार को वापस पाना एक बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक मतदाताओं, विशेषकर बंगाली भाषी मुसलमानों का समर्थन कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। पार्टी को उम्मीद है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी जैसे मुद्दों पर असंतोष का लाभ उसे मिल सकता है।

भाजपा की कल्याणकारी योजनाएं और प्रशासनिक पकड़

सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में राज्य में कई विकास और कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। 'ओरुनोडोई' जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच भाजपा की स्थिति को काफी मजबूत किया है। इसके अलावा, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रशासनिक सुधारों को भाजपा अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। भाजपा का मजबूत पन्ना प्रमुख नेटवर्क और बूथ स्तर की तैयारी कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती पेश करती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में विकास कार्यों की गति में पिछले पांच वर्षों में तेजी आई है, जिसे भाजपा चुनावी मुद्दा बना रही है।

विपक्षी गठबंधन और भविष्य की रणनीति

कांग्रेस इस बार अकेले चुनाव लड़ने के बजाय समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने की रणनीति पर काम कर रही है और पार्टी का लक्ष्य सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाना और एनडीए गठबंधन के भीतर मौजूद असंतुष्ट तत्वों को अपने साथ जोड़ना है। हालांकि, गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर खींचतान की खबरें भी सामने आती रही हैं। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव तक उसके प्रमुख नेता पार्टी के साथ बने रहें। पार्टी आलाकमान अब स्थानीय मुद्दों और राज्य की अस्मिता से जुड़े विषयों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके।