राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को भोपाल में आयोजित ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ में महत्वपूर्ण बयान दिए, जिसमें उन्होंने संघ की भूमिका और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भाजपा या विश्व हिंदू। परिषद (VHP) के नजरिए से आरएसएस को समझना एक भूल है। भागवत ने जोर देकर कहा कि सभी संगठन स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं और संघ किसी भी राजनीतिक दल, विशेषकर भाजपा को नियंत्रित नहीं करता है। संघ का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना, चुनाव लड़ना या टिकट बांटना। नहीं है, बल्कि समाज की गुणवत्ता और चरित्र का निर्माण करना है।
संघ की वास्तविक पहचान और उद्देश्य
डॉ. भागवत ने संघ की कार्यप्रणाली पर भी बात की, जिसमें स्वयंसेवकों का वर्दी पहनना, मार्च निकालना और लाठी का अभ्यास करना शामिल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन गतिविधियों के कारण यदि कोई संघ को पैरा-मिलिट्री फोर्स समझता है, तो यह एक गलत धारणा है और संघ का कार्य समाज में एकता और अनुशासन स्थापित करना है, न कि सैन्य बल के रूप में कार्य करना। उन्होंने कहा कि हमारे मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा और जाति भले ही अलग-अलग हों, लेकिन ‘हिंदू’ पहचान हम सभी को एक सूत्र में पिरोती है। हमारी संस्कृति, धर्म और पूर्वज एक समान हैं, जो हमें एक मजबूत राष्ट्र के रूप में जोड़ते हैं।
विभिन्न मुद्दों पर भागवत के विचार
गोष्ठी में डॉ और मोहन भागवत ने कई समकालीन मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए, जिनमें राजनीति, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, युवाओं की दिशा, पारिवारिक जीवन और पर्यावरण संरक्षण शामिल थे। उन्होंने इन विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को विस्तार से समझाया और समाज को इन दिशाओं में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
स्वदेशी अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता
वैश्विक व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों पर भागवत ने भारत के लिए स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने की वकालत की। उन्होंने कहा कि यदि किसी विदेशी वस्तु की आवश्यकता पड़े भी, तो वह भारत की अपनी शर्तों पर होनी चाहिए। भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत टैरिफ से डरने वाला देश नहीं है, बल्कि उसमें आत्मनिर्भर बनने की अपार क्षमता है। यह दृष्टिकोण देश की आर्थिक संप्रभुता और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
युवाओं को भारतीयता से जोड़ना
आज की ‘जेन-जी’ और युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की। पीढ़ी को बचपन से ही राष्ट्रीय दृष्टि सिखाई जाती है। भारत को भी अपनी युवा पीढ़ी को अपने संस्कारों, इतिहास और समृद्ध विरासत से जोड़ना होगा ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।
फैशन, फास्ट फूड और पारिवारिक जीवन पर चिंता
भागवत ने समाज में बढ़ते फैशन और उपभोक्तावाद की अंधी नकल पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि घर में स्वामी विवेकानंद का चित्र होगा या। किसी पॉप स्टार का, यह समाज की दिशा तय करता है। फास्ट फूड की बढ़ती संस्कृति पर भी उन्होंने संयम बरतने की सलाह दी और परिवारों से साथ बैठकर भोजन करने की पुरानी आदत को फिर से अपनाने का आग्रह किया और यह पारिवारिक एकजुटता और स्वस्थ जीवन शैली के महत्व को दर्शाता है।
संघ को सही मायने में समझना
भागवत ने कहा कि संघ को लेकर समर्थक और विरोधी दोनों ही कई बार गलत नैरेटिव गढ़ते हैं और संघ की असली पहचान समाज निर्माण है और इसी वास्तविक स्वरूप को लोगों तक पहुंचाने के लिए ऐसे संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। संघ किसी के विरोध या प्रतिक्रिया में शुरू नहीं हुआ, न ही उसकी किसी से प्रतिस्पर्धा है। इसके संस्थापक डॉ और केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने और देश के अनेक महापुरुषों से संवाद के बाद समाज संगठन की आवश्यकता महसूस की थी।
भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि स्वतंत्रता तभी स्थायी रह सकती है, जब समाज में ‘स्व’ का बोध हो। देश का भाग्य नेता या नीति नहीं, बल्कि समाज तय करता है और डॉ. हेडगेवार ने इसी विचार के साथ समाज में एकता और गुणवत्ता लाने के लिए संघ की स्थापना की और वर्षों के प्रयोग के बाद उसकी कार्यपद्धति विकसित हुई। संघ ने शुरू से ही तय किया कि वह किसी ‘प्रेशर ग्रुप’ की तरह काम नहीं करेगा, बल्कि उसका लक्ष्य संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करना है। उनका मानना है कि समाज में गुण और अनुशासन आएगा तो देश अपने आप सशक्त बनेगा। इसी उद्देश्य से संघ शाखाओं के माध्यम से राष्ट्रीय वातावरण तैयार करता है।
स्वयंसेवकों का निर्माण और सज्जन शक्ति का नेटवर्क
संघ का कार्य केवल स्वयंसेवक निर्माण तक सीमित है। स्वयंसेवक समाज की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं, और संघ किसी भी स्वयंसेवक के काम को रिमोट कंट्रोल से संचालित नहीं करता। भागवत ने यह भी कहा कि केवल संघ ही समाज सुधार का कार्य कर रहा है, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। सभी मत-पंथों में सज्जन लोग हैं और जरूरत है कि इन सभी के बीच एक सहयोगी नेटवर्क बने। संघ इसी वातावरण के निर्माण का प्रयास कर रहा है।
पंच परिवर्तन का आह्वान
समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए सरसंघचालक ने ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान किया है: सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन। उन्होंने कहा कि इन पांच बिंदुओं पर समाज को मिलकर काम करना होगा ताकि एक मजबूत, एकजुट और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण हो सके।