राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर के लिए यह गर्व का क्षण है कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की महिला कांस्टेबल मंजू जांगिड़ का चयन संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के लिए हुआ है। मंजू जांगिड़ अब अफ्रीकी देश कांगो में अपनी सेवाएं देंगी, जहां वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी संभालेंगी। वह बीएसएफ की 160 सदस्यीय 19वीं टुकड़ी के साथ इस मिशन के लिए रवाना हुई हैं। इस विशेष टुकड़ी में कुल 24 महिला प्रहरियों को शामिल किया गया है, जिनमें मंजू जांगिड़ भी एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाएंगी।
बाड़मेर की पहली महिला बीएसएफ कांस्टेबल का गौरव
मंजू जांगिड़ ने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सेवाएं देने वाली बाड़मेर की पहली महिला बीएसएफ कांस्टेबल बनकर एक नया इतिहास रच दिया है। बाड़मेर के खड़ीन गांव की बेटी और चवा गांव की बहू के रूप में उनकी यह उपलब्धि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है। एक ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना उनकी कड़ी मेहनत और अटूट साहस का परिणाम है। उनकी यह सफलता दर्शाती है कि भारतीय महिलाएं अब केवल घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक शांति अभियानों में भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करा रही हैं। कांगो जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में तैनाती के लिए उनका चयन उनकी पेशेवर दक्षता को दर्शाता है।
पारिवारिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समन्वय
रेगिस्तान की इस जांबाज बेटी ने यह साबित कर दिया है कि गृहस्थी और देश सेवा के मोर्चों को एक साथ बखूबी संभाला जा सकता है और मंजू अपने परिवार में एक बेटी, बहू और मां के दायित्वों को पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं। अब वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता की रक्षा के लिए मुस्तैद नजर आएंगी। उनका यह सफर इस बात का प्रमाण है कि यदि हौसले बुलंद हों और इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकती। उन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और पेशेवर कर्तव्यों के बीच एक बेहतरीन संतुलन स्थापित किया है, जो आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल है।
साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण सफलता
मंजू जांगिड़ की यह सफलता इसलिए भी विशेष है क्योंकि वह एक अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं। उनके पिता मोहन सिंह सुथार शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं और उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया। एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी मंजू ने अपने पिता के मार्गदर्शन में शिक्षा और अनुशासन के महत्व को समझा, जिसने उन्हें बीएसएफ में भर्ती होने और फिर संयुक्त राष्ट्र के मिशन के लिए चुने जाने के योग्य बनाया। उनके पिता का अटूट विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है।
पति का अटूट सहयोग और प्रेरणा
मंजू के इस सफर में उनके पति ईश्वरलाल सुथार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। चवा गांव में कारपेंटर का कार्य करने वाले ईश्वरलाल ने मंजू के सपनों को पंख देने में उनका पूरा सहयोग किया। एक छोटे से गांव में रहते हुए अपनी पत्नी के करियर और उसकी अंतरराष्ट्रीय आकांक्षाओं का समर्थन करना समाज के लिए एक बड़ा संदेश है। मंजू का संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठित सेना का हिस्सा बनना क्षेत्र की हर उस बेटी के लिए एक बड़ी प्रेरणा है, जो जीवन में कुछ अलग और बड़ा करने का सपना देखती है। एक कारपेंटर पति और बीएसएफ जवान पत्नी की यह जोड़ी रूढ़ियों को तोड़ने का काम कर रही है।
पूरे जिले में खुशी और गर्व का माहौल
मंजू जांगिड़ के चयन की खबर मिलते ही उनके पैतृक गांव खड़ीन और ससुराल चवा सहित पूरे बाड़मेर जिले में खुशी की लहर दौड़ गई है। ग्रामीणों और शुभचिंतकों ने उनके परिवार को बधाई दी और उनकी सफलता पर गर्व व्यक्त किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंजू ने न केवल अपने परिवार और समाज का मान बढ़ाया है, बल्कि पूरे सीमावर्ती क्षेत्र का सिर अंतरराष्ट्रीय पटल पर गर्व से ऊंचा कर दिया है। उनकी यह तैनाती बाड़मेर के युवाओं के लिए एक मिसाल है कि मेहनत और लगन से किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है। 160 सदस्यीय इस दल में शामिल होकर वह भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
