Chhath Puja 2025 / छठ पूजा का संध्या अर्घ्य का शुभ मुहूर्त और विधि, जानें उषा अर्घ्य का भी समय

छठ पूजा 2025 का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य के साथ मनाया जाएगा। इस साल 27 अक्टूबर को शाम 5:10 बजे से 5:48 बजे तक डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। अगले दिन, 28 अक्टूबर को सुबह 6:00 बजे से 6:34 बजे तक उषा अर्घ्य होगा। जानें विस्तृत विधि और महत्व।

छठ पूजा, जिसे सूर्य षष्ठी, डाला पूजा और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। प्रकृति, विशेषकर सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित यह चार दिवसीय महापर्व कठोर तपस्या, शुद्धता और श्रद्धा का प्रतीक है। वर्ष 2025 में, छठ पूजा का तीसरा दिन, जो संध्या अर्घ्य के लिए समर्पित है, 27 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जब भक्त डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करेंगे।

छठ पूजा 2025: संध्या और उषा अर्घ्य के महत्वपूर्ण समय

छठ महापर्व के दौरान सूर्य देव को अर्घ्य देने का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। वर्ष 2025 के लिए, संध्या अर्घ्य का शुभ समय 27 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 10 मिनट से शाम 5 बजकर 48 मिनट तक निर्धारित किया गया है और इस दौरान व्रतधारी नदी के घाटों या जलाशयों में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके अगले दिन, यानी 28 अक्टूबर 2025 को, उषा अर्घ्य का समय सुबह 6 बजे से सुबह 6 बजकर 34 मिनट तक रहेगा, जब उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा। ये दोनों अर्घ्य छठ पूजा के सबसे पवित्र और प्रतीकात्मक अनुष्ठानों में। से हैं, जो सूर्य की जीवनदायिनी ऊर्जा के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

संध्या अर्घ्य की पवित्र विधि

संध्या अर्घ्य की विधि अत्यंत विस्तृत और भक्तिपूर्ण होती है। इस दिन, व्रतधारी साफ-सुथरे और पारंपरिक वस्त्र धारण कर अपने पूरे परिवार के साथ घाट या जलाशय पर पहुंचते हैं। एक बांस की टोकरी, जिसे सूप या दौरा कहा जाता है, में ठेकुआ, विभिन्न प्रकार के फल जैसे केला, सेब, संतरा, नारियल, गन्ना, मिट्टी के दीपक, धूप, अगरबत्ती, हल्दी, सिंदूर और अन्य पवित्र प्रसाद सामग्री सावधानीपूर्वक रखी जाती है। सूर्य देव के अस्त होने से ठीक पहले, व्रतधारी जल में कमर तक खड़े होकर हाथ में टोकरी लेकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस दौरान, वे 'ॐ सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करते हैं और पारंपरिक छठ गीत गाए जाते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है और अर्घ्य के बाद, व्रतधारी सूर्य देव और छठी मैया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान सुख और उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। यह अनुष्ठान न केवल शारीरिक तपस्या है, बल्कि मानसिक शुद्धता और समर्पण का भी प्रतीक है।

गहरी जड़ें जमाए परंपराएं और कड़े नियम

छठ पूजा अपने कड़े नियमों और शुद्धता के पालन के लिए प्रसिद्ध है। व्रतधारी को इस दौरान अत्यंत शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना होता है और छठ पूजा के दौरान केवल शुद्ध सात्विक भोजन ही ग्रहण किया जाता है, जिसमें लहसुन और प्याज का प्रयोग वर्जित होता है। व्रती द्वारा बनाए गए भोजन में गंगाजल का उपयोग किया जाता है और इसे मिट्टी या कांसे के बर्तनों में ही पकाया जाता है और छठ पूजा का सबसे कठिन नियम निर्जला व्रत है, जिसमें व्रतधारी 36 घंटों तक अन्न और जल का त्याग करते हैं। इस व्रत में व्रतधारी को नदी, तालाब या किसी स्वच्छ जलाशय में स्नान करना अनिवार्य होता है। यह स्नान शरीर और मन की शुद्धि के लिए किया जाता है। संध्या और उषा अर्घ्य के समय भी जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है, जो इस पर्व की विशिष्ट पहचान है। इन नियमों का पालन करना व्रतधारी के अटूट विश्वास और भक्ति को दर्शाता है।

छठ पूजा का महत्व और सांस्कृतिक प्रभाव

छठ पर्व भगवान सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की पूजा-अर्चना का त्योहार है। माना जाता है कि सूर्य देव सभी प्राणियों को ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं, जबकि छठी मैया संतान सुख, आरोग्य और समृद्धि प्रदान करती हैं। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका भी है। छठ पूजा के दौरान लोग जल संरक्षण और पर्यावरण स्वच्छता के प्रति भी जागरूक होते हैं, क्योंकि अर्घ्य नदियों और जलाशयों में दिया जाता है और इस पर्व को कई नामों से जाना जाता है, जैसे सूर्य षष्ठी, छठ, छठी, छठ पर्व, डाला पूजा और डाला छठ। यह पर्व पारिवारिक एकजुटता और सामुदायिक सौहार्द का भी प्रतीक है, जहाँ सभी लोग मिलकर घाटों की सफाई करते हैं और पूजा में सहयोग करते हैं। यह त्योहार भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।

पवित्र प्रसाद (सामग्री) की तैयारी

छठ पूजा की सामग्री का चयन और तैयारी भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूजा के लिए बांस की टोकरी (सूप) अनिवार्य है, जिसका उपयोग प्रसाद और अन्य पूजा सामग्री रखने के लिए किया जाता है। ठेकुआ, जो गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी और घी से बना एक पारंपरिक मीठा पकवान है, छठ पूजा का विशेष प्रसाद होता है। विभिन्न मौसमी फल जैसे केला, सेब, सिंघाड़ा, नारियल और गन्ना भी चढ़ाए जाते हैं। गंगाजल स्नान और सूर्य को अर्घ्य देने के लिए आवश्यक है,। जबकि जल से भरा नारियल पूजा के लिए शुभ माना जाता है। मिट्टी का दीपक और शुद्ध घी, धूप और अगरबत्ती सूर्य देव की आरती और पूजन के लिए इस्तेमाल होते हैं। सुहागन स्त्रियां सिंदूर और हल्दी का विशेष रूप से उपयोग करती हैं, और कपूर पूजा में आरती के लिए एक महत्वपूर्ण सामग्री है। इन सभी सामग्रियों का अपना प्रतीकात्मक महत्व है और ये पूजा की पवित्रता को बढ़ाते हैं।

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