ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने विशेष रूप से चीन, पश्चिम एशिया और भारत की कूटनीतिक भूमिका को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इस विरोध के बीच पार्टी के भीतर ही अलग-अलग सुर भी देखने को मिले हैं। जहां एक ओर पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सम्मेलन की सार्थकता पर सवाल उठाए, वहीं शशि थरूर ने इसे भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि और सम्मान के रूप में देखा है।
पी चिदंबरम का कूटनीतिक लाभ पर सवाल
पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि पिछले 2 से 3 ब्रिक्स सम्मेलनों से कोई भी ठोस नतीजा या लाभ निकलकर सामने नहीं आया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत ब्रिक्स, एससीओ, जी20 और क्वाड जैसे महत्वपूर्ण समूहों का सदस्य तो है, लेकिन इन मंचों से देश को वास्तव में क्या हासिल हो रहा है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। चिदंबरम के अनुसार, पहले के सम्मेलनों में कुछ ठोस और वास्तविक लाभ दिखाई देते थे, जो अब नदारद हैं। उनके इस बयान ने सरकार की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
शशि थरूर का अलग रुख और भाजपा का पलटवार
चिदंबरम के विपरीत, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ब्रिक्स सम्मेलन को भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक सम्मान बताया। थरूर ने तर्क दिया कि ब्रिक्स दुनिया की अधिकांश आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए इसमें भारत की सक्रिय भूमिका महत्वपूर्ण है और थरूर के इस बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए इसे नाराज फूफा वाली मानसिकता करार दिया। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस भारत की वैश्विक तरक्की को पचा नहीं पा रही है और पार्टी के भीतर ही भारी मतभेद हैं।
सलमान खुर्शीद और पश्चिम एशिया संकट
कांग्रेस के विदेश मामलों के प्रमुख सलमान खुर्शीद ने कहा कि भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता का उपयोग अपनी ऐतिहासिक कूटनीतिक प्रतिष्ठा और स्थान को बहाल करने के लिए करना चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि पश्चिम एशिया संकट में सरकार की भूमिका बहुत सीमित रही है। कांग्रेस का मानना है कि ईरान, जो कि एक ब्रिक्स सदस्य है, पर हमलों के प्रति सरकार के रुख से ऐसी धारणा बनी जैसे वह इन हमलों का समर्थन या सहमति दे रही हो। इसके अलावा, दक्षिण अफ्रीका जैसे सदस्य देशों को भी भारत से पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। खुर्शीद ने मांग की कि केवल घोषणाएं करने के बजाय ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।
रणनीतिक स्पष्टता और सुरक्षा परिषद की मांग
कांग्रेस ने सरकार से नैतिक नेतृत्व और रणनीतिक स्पष्टता की मांग की है।
चीन नीति और 112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा
कांग्रेस ने मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के साथ-साथ लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में सीमा विवाद को लेकर सरकार को घेरा। पार्टी ने ऑपरेशन सिंदूर में चीन की कथित भूमिका और चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे पर चिंता जताई, जो लगभग 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कांग्रेस का आरोप है कि सीमा पर चीन को रियायतें दी गई हैं और आर्थिक रूप से चीन पर निर्भरता देश के लिए खतरनाक है और पार्टी ने मांग की कि प्रधानमंत्री को चीन से भारतीय क्षेत्र खाली कराने के मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
शाकाहारी मेन्यू और अन्य विवाद
सम्मेलन के आयोजन को लेकर भी कांग्रेस ने कई आपत्तियां दर्ज कराईं। राहुल गांधी सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने विदेशी मेहमानों को केवल शाकाहारी भोजन परोसने के फैसले पर सवाल उठाए। इसके अलावा, आयोजन के दौरान झुग्गियों को हरे पर्दों से छिपाने की कार्रवाई पर भी सरकार की आलोचना की गई। पहलगाम आतंकी हमले की निंदा के दौरान अपराधियों का नाम न लिए जाने पर भी सवाल उठाए गए। जब सम्मेलन में बांडुंग स्पिरिट का जिक्र आया, तो कांग्रेस ने नेहरू युग के नोट्स साझा करते हुए सरकार पर कटाक्ष किया।
ग्लोबल साउथ और मनमोहन सिंह का योगदान
कांग्रेस ने याद दिलाया कि ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ के एक मजबूत मंच के रूप में विकसित करने की नींव मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रखी गई थी, जब न्यू डेवलपमेंट बैंक का प्रस्ताव आया था और पार्टी का कहना है कि वह ब्रिक्स के महत्व को स्वीकार करती है, लेकिन मौजूदा सरकार इसे रणनीतिक रूप से सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। कांग्रेस के अनुसार, सरकार चीन और पश्चिम एशिया की नीतियों में कमजोर साबित हो रही है, जबकि भाजपा इन आरोपों को केवल नकारात्मकता फैलाने का प्रयास मानती है।
