आज, शनिवार 1 नवंबर को कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, जिसे देवउठनी एकादशी के रूप में मनाया जा रहा है और यह दिन हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योग निद्रा से जागृत होते हैं। भगवान विष्णु के जागृत होने के साथ ही सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है, जो चातुर्मास के दौरान वर्जित थे और ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन पर व्रत रखने और देवउठनी एकादशी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
देवउठनी एकादशी का महत्व
देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के भक्तों के लिए एक उत्सव का दिन होता है। चातुर्मास के दौरान, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं, तब विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ कार्य रोक दिए जाते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान के जागृत होने के साथ ही इन सभी कार्यों को फिर से शुरू करने की अनुमति मिल जाती है। यह दिन आध्यात्मिक उन्नति और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तगण इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
राजा और स्त्री की प्रेरक कथा
देवउठनी एकादशी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा एक धर्मपरायण राजा और एक रहस्यमयी स्त्री के बारे में है और प्राचीन काल में एक राज्य था जहाँ एकादशी के दिन अन्न का व्यापार नहीं किया जाता था और सभी प्रजा फलाहार पर रहती थी। एक बार भगवान विष्णु ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और वे राज्य की सड़क पर बैठ गए और राजा उस स्त्री के अनुपम सौंदर्य पर मोहित हो गए और उन्होंने उसे अपनी रानी बनने का प्रस्ताव दिया। स्त्री ने राजा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, लेकिन एक शर्त रखी। उसने कहा कि उसे राज्य पर पूर्ण अधिकार चाहिए और उसे अपनी इच्छानुसार भोजन करने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। राजा ने उसकी शर्त मान ली।
धर्मपरायणता की कठिन परीक्षा
एक एकादशी के दिन, विष्णु जी ने स्त्री के रूप में राजा को मांसाहार भोजन करने के लिए विवश करने का प्रयास किया। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा और एकादशी व्रत का हवाला देते हुए मांसाहार करने से इनकार कर दिया। तब स्त्री रूपी भगवान विष्णु ने राजा को उसकी शर्त याद दिलाई कि यदि उसने। उसकी बात नहीं मानी और भोजन नहीं किया, तो वह उसके राजकुमार का सिर काट देगी। यह सुनकर राजा धर्मसंकट में पड़ गए। उन्होंने अपनी बड़ी रानी से सलाह ली, जिन्होंने राजा को धर्म न छोड़ने की सलाह दी। रानी ने कहा कि पुत्र तो दोबारा प्राप्त हो सकता। है, लेकिन धर्म एक बार छूट जाए तो वापस नहीं मिलता।
भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कथा
जब राजकुमार ने यह बात सुनी, तो उसने स्वयं को बलिदान करने की पेशकश की ताकि उसके पिता अपने धर्म का पालन कर सकें और राजकुमार की इस निस्वार्थ भावना और राजा की धर्मपरायणता को देखकर रानी के रूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए। वे राजा की निष्ठा और धर्म के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा से अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान विष्णु ने राजा को मुक्ति और परम लोक में निवास का वरदान दिया। इसके बाद राजा ने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं विमान में बैठकर स्वर्ग लोक चले गए और यह कथा हमें धर्म के प्रति अडिग रहने और किसी भी परिस्थिति में अपनी नैतिक मूल्यों को न त्यागने की प्रेरणा देती है। एक अन्य महत्वपूर्ण कथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के संवाद से संबंधित है। एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे दिन-रात बिना विश्राम किए जागते रहते हैं और जब वे सोते हैं, तो लाखों वर्षों के लिए गहरी निद्रा में चले जाते हैं, जिससे पूरी सृष्टि में असंतुलन पैदा हो सकता है। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से नियमित रूप से विश्राम करने का अनुरोध किया ताकि सृष्टि का संतुलन बना रहे।
चातुर्मास और अल्पनिद्रा का महत्व
माता लक्ष्मी की बात सुनकर भगवान विष्णु ने उनकी बात मानी और। कहा कि वे वर्षा ऋतु के दौरान चार महीने के लिए शयन करेंगे। उन्होंने बताया कि इस अवधि में उन्हें भी पर्याप्त आराम मिलेगा। भगवान विष्णु ने अपनी इस निद्रा को 'अल्पनिद्रा' का नाम दिया। और कहा कि यह उनके भक्तों के लिए अत्यंत मंगलकारी होगी। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि जो भी भक्त इस 'अल्पनिद्रा' के दौरान। उनकी सेवा करेंगे, उनके घर में माता लक्ष्मी सहित वे स्वयं निवास करेंगे। यह कथा चातुर्मास के महत्व को दर्शाती है और बताती है कि इस अवधि में भगवान की भक्ति और सेवा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। देवउठनी एकादशी इसी अल्पनिद्रा के समापन का प्रतीक है, जब भगवान विष्णु पुनः जागृत। होकर सृष्टि के संचालन का कार्यभार संभालते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं।
