सुप्रीम कोर्ट का बंगाल पर फैसला: SIR प्रक्रिया जारी, वोटर लिस्ट डेडलाइन बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया। साथ ही, मतदाता सूची के प्रकाशन की समय सीमा एक सप्ताह बढ़ा दी गई है।

नई दिल्ली: देश के विभिन्न राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी कानूनी विवाद के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा। अदालत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस मामले में व्यक्तिगत रूप से वकील बनकर पैरवी करने की कोशिश को भी खारिज कर दिया। यह घटनाक्रम राज्य में चुनावी तैयारियों और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर चल रही खींचतान के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।

ममता बनर्जी के हस्तक्षेप पर न्यायालय का रुख

सुनवाई के दौरान एक असामान्य स्थिति तब उत्पन्न हुई जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं वकील के रूप में मामले में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए उनकी दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और न्यायिक मर्यादा के तहत इस तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को इस जांच प्रक्रिया में अपनी ओर से किसी भी तरह की दखलअंदाजी करने की आवश्यकता नहीं है और चुनाव आयोग को अपनी स्वायत्तता के साथ कार्य करने देना चाहिए।

चुनाव आयोग के अधिकारियों की सुरक्षा और हिंसा पर चिंता

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल और याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग (ECI) के अधिकारियों के खिलाफ हो रही हिंसा और धमकियों का मुद्दा उठाया। न्यायालय को सूचित किया गया कि अधिकारियों को डराया जा रहा है और पुलिस कई मामलों में प्राथमिकी (FIR) तक दर्ज नहीं कर रही है। इस पर गंभीर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। DGP को चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए सुरक्षा में चूक के आरोपों पर स्पष्टीकरण देना होगा। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

मतदाता सूची की समय सीमा में विस्तार और प्रशासनिक निर्देश

प्रशासनिक जटिलताओं और सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समय सीमा को बढ़ा दिया है। पहले यह समय सीमा 14 फरवरी निर्धारित थी, जिसे अब एक सप्ताह के लिए आगे बढ़ा दिया गया है। इसके साथ ही, न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सूची में शामिल सभी 8505 ग्रुप-बी अधिकारी कल शाम 5 बजे तक अपनी ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करें। चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया गया है कि वह मौजूदा निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) और सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (AERO) को बदल सके या उनकी योग्यता के आधार पर उनकी सेवाएं जारी रख सके।

न्यायिक विश्लेषण और संवैधानिक स्वायत्तता

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता को पुख्ता करता है। अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची तैयार करने और चुनावों के संचालन का पूर्ण अधिकार है। न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से यह संदेश दिया है कि राज्य सरकारें केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं में बाधा नहीं डाल सकतीं। SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है, और इसमें किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक ढांचे के लिए हानिकारक हो सकता है।

निष्कर्ष और भविष्य की रूपरेखा

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस प्रशासन पर चुनाव आयोग के अधिकारियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी है। 8505 अधिकारियों की तैनाती और समय सीमा में विस्तार से यह सुनिश्चित होने की उम्मीद है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कार्य बिना किसी भय और पक्षपात के पूरा हो सकेगा। DGP द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं, जो राज्य में कानून-व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता की स्थिति को स्पष्ट करेगा।

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