ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर प्रक्रिया को दी चुनौती

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से दलीलें पेश कीं। उन्होंने चुनाव आयोग पर बंगाल को निशाना बनाने और विवाहित महिलाओं के नाम हटाने का आरोप लगाया, जिसके बाद कोर्ट ने आयोग को नोटिस जारी किया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से अपनी दलीलें पेश कीं। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के खिलाफ दायर इस याचिका में मुख्यमंत्री ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई सोमवार के लिए निर्धारित की है।

मतदाता सूची से नाम हटाने का गंभीर आरोप

न्यायालय में अपनी बात रखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया का उपयोग मुख्य रूप से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि कई नागरिकों के नाम बिना उचित प्रक्रिया के सूची से गायब कर दिए गए हैं और मुख्यमंत्री ने अदालत को बताया कि निर्वाचन आयोग उनकी शिकायतों का संतोषजनक जवाब नहीं दे रहा है, जिसके कारण उन्हें न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

विवाहित महिलाओं और प्रवासियों की समस्या

ममता बनर्जी ने विशेष रूप से उन महिलाओं का मुद्दा उठाया जिनके नाम शादी के बाद उपनाम बदलने के कारण सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि बेटियों से उनके पति का सरनेम इस्तेमाल करने पर सवाल किए जा रहे हैं और इसी आधार पर उनके नाम काटे जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने उन गरीब लोगों का भी जिक्र किया जो काम के सिलसिले में दूसरी जगहों पर शिफ्ट हो गए हैं, लेकिन उनके नाम भी मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।

बंगाल को निशाना बनाने का दावा

मुख्यमंत्री ने अदालत में दलील दी कि केवल पश्चिम बंगाल को ही इस तरह की सख्त शर्तों के साथ निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में आधार कार्ड के साथ एक अतिरिक्त प्रमाण पत्र की मांग की जा रही है, जबकि असम या अन्य राज्यों में ऐसी कोई शर्त लागू नहीं है। उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया शीर्ष अदालत के पिछले आदेशों का उल्लंघन कर रही है।

न्यायालय की टिप्पणी और अगली कार्यवाही

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत पहले ही मतदाता सूची संशोधन की समय सीमा को 10 दिन बढ़ा चुकी है और इसे बार-बार नहीं बढ़ाया जा सकता। पीठ ने मुख्यमंत्री को टोकते हुए यह भी कहा कि राज्य की पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता उपलब्ध हैं, फिर भी अदालत ने उनकी दलीलों को ध्यानपूर्वक सुना। विश्लेषकों के अनुसार, इस मामले में अब सोमवार को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी क्योंकि चुनाव आयोग को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।

अदालत ने आश्वासन दिया है कि वह समाधान निकालने का पूरा प्रयास करेगी ताकि किसी भी निर्दोष नागरिक का नाम मतदाता सूची से न छूटे। फिलहाल, सभी की नजरें सोमवार को होने वाली विस्तृत सुनवाई और चुनाव आयोग के जवाब पर टिकी हैं।

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