मणिपुर में लंबे समय से जारी राजनीतिक अनिश्चितता और केंद्रीय शासन का दौर अब समाप्त हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक अधिसूचना के माध्यम से राज्य से राष्ट्रपति शासन तत्काल प्रभाव से हटा लिया गया है। इस संवैधानिक बदलाव के साथ ही राज्य को नया नेतृत्व भी मिल गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और विधायक दल के नवनिर्वाचित नेता युमनाम खेमचंद ने मणिपुर के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की है। इंफाल स्थित लोकभवन में आयोजित एक औपचारिक समारोह में राज्यपाल अजय भल्ला ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
संवैधानिक प्रक्रिया और नई सरकार का गठन
गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में स्पष्ट किया गया कि मणिपुर में संवैधानिक तंत्र की बहाली के लिए राष्ट्रपति शासन को वापस लिया जा रहा है। युमनाम खेमचंद के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ गठबंधन सहयोगी दलों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में भाजपा के पास 37 विधायकों का स्पष्ट बहुमत है। इसके अतिरिक्त, नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के 6 और नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के 5 विधायकों का समर्थन भी सरकार को प्राप्त है। इस राजनीतिक समीकरण ने राज्य में एक स्थिर सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त किया है।
युमनाम खेमचंद: एक अनुभवी नेतृत्व का परिचय
62 वर्षीय युमनाम खेमचंद मणिपुर की राजनीति में एक अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। पेशे से इंजीनियर रहे खेमचंद मैतेई समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और सिंगजामेई विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह पूर्ववर्ती एन. बीरेन सिंह सरकार में नगर प्रशासन और आवास विभाग के मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। खेमचंद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का करीबी माना जाता है और 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद भी उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में प्रमुखता से उभरा था। उनकी छवि एक शांत और प्रशासनिक दक्षता वाले नेता की रही है, जो वर्तमान परिस्थितियों में राज्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विधायक दल के नेता का चुनाव और राजनीतिक घटनाक्रम
मुख्यमंत्री पद के लिए युमनाम खेमचंद का चयन एक गहन राजनीतिक प्रक्रिया के बाद हुआ। मंगलवार को भाजपा मुख्यालय में आयोजित विधायक दल की बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से नेता चुना गया। इस चयन प्रक्रिया के लिए भाजपा आलाकमान ने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग को पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया था। हालांकि मुख्यमंत्री की दौड़ में गोविंद दास और टी. विश्वजीत सिंह जैसे कद्दावर नेताओं के नाम भी शामिल थे, लेकिन अंततः खेमचंद के नाम पर मुहर लगी और गोविंद दास, जो 7 बार के विधायक हैं और जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का समर्थन प्राप्त था, ने भी नई सरकार के गठन में अपनी भूमिका सुनिश्चित की है।
जातीय संघर्ष और राष्ट्रपति शासन की पृष्ठभूमि
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की स्थिति मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा के बाद उत्पन्न हुई थी। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हुए इस संघर्ष में अब तक 260 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। प्रशासनिक चुनौतियों और सुरक्षा स्थिति को देखते हुए 13 फरवरी 2025 को राज्य में पहली बार 6 महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जिसे अगस्त 2025 में पुनः 6 महीने के लिए बढ़ा दिया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद से ही केंद्र सरकार राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था की सीधी निगरानी कर रही थी।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और भविष्य की चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, युमनाम खेमचंद के नेतृत्व वाली नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य में शांति बहाली और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास पैदा करना है। गृह मंत्रालय की निगरानी में सुरक्षा बलों की तैनाती और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास जारी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि एक निर्वाचित सरकार की वापसी से स्थानीय स्तर पर संवाद की प्रक्रिया तेज हो सकती है और हालांकि, कुकी और मैतेई समुदायों के बीच की खाई को पाटना और विस्थापितों का पुनर्वास करना नई सरकार की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रहेगा।
निष्कर्षतः, मणिपुर में राष्ट्रपति शासन का अंत और नई सरकार का शपथ ग्रहण राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम है। युमनाम खेमचंद के सामने अब न केवल कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने की जिम्मेदारी है, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने की भी कठिन चुनौती है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह राज्य सरकार को हर संभव सुरक्षा और वित्तीय सहायता प्रदान करना जारी रखेगी ताकि मणिपुर में पूर्ण सामान्य स्थिति बहाल की जा सके।
