इलेक्ट्रिक कार खरीदते समय लोगों के मन में सिर्फ रेंज और चार्जिंग को लेकर ही सवाल नहीं होते, बल्कि बैटरी खराब होने पर उसे बदलने का खर्च भी एक बड़ी चिंता का विषय होता है और बैटरी किसी भी इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) के सबसे महंगे हिस्सों में से एक होती है, इसलिए इसकी लागत पूरी गाड़ी की कीमत को प्रभावित करती है। हालांकि, भारत में अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। बैटरी टेक्नोलॉजी में लगातार हो रहे सुधार और बड़े पैमाने पर उत्पादन यानी मास प्रोडक्शन से इसकी लागत घटाने के नए रास्ते खुल रहे हैं।
बैटरी बनाने की टेक्नोलॉजी में क्या बदलाव आया है?
बैटरी बनाने वाली कंपनियां अब बेहतर सेल केमिस्ट्री, नए डिजाइन और ज्यादा आसान मैन्युफैक्चरिंग तरीकों पर गंभीरता से काम कर रही हैं। इस नई तकनीक का मुख्य उद्देश्य कम मटीरियल का उपयोग करके ज्यादा एनर्जी स्टोर करना और उत्पादन के दौरान होने वाली बर्बादी को कम करना है। नए बैटरी पैक के स्ट्रक्चर को अब पहले से ज्यादा सरल बनाया जा रहा है, जिससे उनमें लगने वाले अतिरिक्त पार्ट्स की जरूरत कम हो गई है। इसे स्मार्टफोन की टेक्नोलॉजी के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है और जिस तरह समय के साथ फोन के प्रोसेसर, कैमरे और बैटरी बेहतर हुए हैं और बड़े पैमाने पर उत्पादन से पुराने कंपोनेंट सस्ते हुए हैं, ठीक वैसा ही बदलाव अब ईवी बैटरी इंडस्ट्री में भी देखने को मिल रहा है।
ज्यादा उत्पादन और नई केमिस्ट्री का बड़ा फायदा
जब कंपनियां बहुत बड़ी संख्या में बैटरी सेल का निर्माण करती हैं, तो फैक्ट्रियों की कार्यक्षमता का बेहतर इस्तेमाल होता है। इससे सप्लायर भी बड़े स्तर पर काम कर पाते हैं और उत्पादन का कुल खर्च ज्यादा यूनिट्स में बंट जाता है, जिससे प्रति यूनिट लागत कम हो जाती है। इसके अलावा, बाजार में कंपनियों के बीच बढ़ता मुकाबला भी कीमतों को कम करने का दबाव बनाता है। बैटरी केमिस्ट्री में हो रहा बदलाव भी इसमें अहम भूमिका निभा रहा है। लिथियम आयरन फॉस्फेट यानी एलएफपी बैटरी इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। कई इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए यह एक कम लागत वाला विकल्प साबित हो रही है। हालांकि, हर गाड़ी के लिए एक ही तरह की बैटरी सही नहीं होती, इसलिए कंपनियां रेंज, परफॉर्मेंस, कीमत और टिकाऊपन के आधार पर अलग-अलग टेक्नोलॉजी का चुनाव करती हैं।
क्या पुरानी इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी बदलना भी सस्ता होगा?
बैटरी उत्पादन की लागत कम होने से भविष्य में रिप्लेसमेंट पैक के सस्ते होने की संभावना तो है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर इलेक्ट्रिक कार की बैटरी बदलने का खर्च अपने आप कम हो जाएगा। किसी भी नई बैटरी का कार के सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, आकार और सुरक्षा मानकों के साथ पूरी तरह मेल खाना अनिवार्य है। एक राहत की बात यह भी है कि हर समस्या में पूरा बैटरी पैक बदलना जरूरी नहीं होता। अगर खराबी किसी खास सेल या सेक्शन तक सीमित है, तो कुछ विशेष मामलों में उसकी मरम्मत यानी रिपेयरिंग भी संभव हो सकती है। जैसे-जैसे सर्विस नेटवर्क और रिपेयर टेक्नोलॉजी बेहतर होगी, ईवी मालिकों को भविष्य में और भी बेहतर विकल्प मिल सकेंगे।
भारत में बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और सरकारी योजनाओं का महत्व
भारत सरकार घरेलू स्तर पर बैटरी बनाने की क्षमता को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई पीएलआई स्कीम इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। स्थानीय सप्लाई चेन को मजबूत करना और बैटरी रीसाइक्लिंग का विस्तार करना लंबे समय में काफी मददगार साबित हो सकता है। हालांकि, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, आयात पर निर्भरता और सप्लाई चेन में होने वाले बदलाव बैटरी की अंतिम लागत को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि हर मॉडल की रिप्लेसमेंट कीमत घटने की कोई निश्चित गारंटी नहीं दी जा सकती, लेकिन रुझान सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।
