हवाई यात्रियों को बड़ी राहत, सरकार ने 3 साल के लिए तय की जेट फ्यूल की कीमतें

केंद्र सरकार ने हवाई यात्रियों को राहत देते हुए जेट फ्यूल के लिए प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम शुरू की है। इसके तहत घरेलू एयरलाइंस के लिए ईंधन की कीमतें 3 साल तक स्थिर रहेंगी, जिससे विमान किरायों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी पर लगाम लगेगी।

हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए केंद्र सरकार की ओर से एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए विमान ईंधन यानी जेट फ्यूल की कीमतों को अगले तीन साल तक के लिए स्थिर करने की योजना बनाई है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से आम यात्रियों को बचाना है। सरकारी तेल कंपनियों ने एक प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम (कीमतों को स्थिर रखने की योजना) की शुरुआत की है और इस योजना के तहत घरेलू एयरलाइंस को तीन साल तक के लिए ईंधन की एक निश्चित कीमत दी जाएगी, जिससे विमान किरायों में अचानक होने वाली भारी बढ़ोतरी पर लगाम लगेगी।

जेट फ्यूल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि और नया मॉडल

हाल ही में तेल कंपनियों ने एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की है। इस बढ़ोतरी के साथ ही एक नया फिक्स्ड प्राइसिंग मॉडल पेश किया गया है और पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए फॉर्मूले के तहत घरेलू एयरलाइंस के लिए जेट फ्यूल की कीमत अब 104 रुपये 92 पैसे प्रति लीटर से बढ़कर 115 रुपये प्रति लीटर हो जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा का इजाफा हुआ है। जो एयरलाइंस इस सरकारी स्कीम का हिस्सा बनेंगी, उनके लिए यह नई कीमत अगले तीन साल तक स्थिर रहेगी। हालांकि, जो एयरलाइंस इस स्कीम को नहीं चुनेंगी, उन्हें अंतरराष्ट्रीय दरों के हिसाब से भुगतान करना होगा, जो वर्तमान में लगभग 142 रुपये प्रति लीटर के करीब है।

स्वैच्छिक योजना और एयरलाइंस के पास विकल्प

यह प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम पूरी तरह से स्वैच्छिक है, यानी एयरलाइंस अपनी मर्जी से इसे चुन सकती हैं। जो एयरलाइंस इसमें शामिल होंगी, उन्हें 115 रुपये प्रति लीटर की दर से ईंधन मिलता रहेगा और वे वैश्विक बाजार की अस्थिरता से सुरक्षित रहेंगी। इसके विपरीत, जो कंपनियां इस स्कीम से बाहर रहेंगी, उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के गिरने का फायदा तो मिल सकता है, लेकिन कीमतें बढ़ने पर उन्हें 142 रुपये प्रति लीटर जैसी ऊंची दरें चुकानी पड़ेंगी। यह योजना एयरलाइंस को अपने परिचालन खर्चों का बेहतर प्रबंधन करने में मदद करेगी, क्योंकि ईंधन की लागत उनके कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा होती है।

महानगरों में ईंधन के दाम और बेंचमार्क दरें

इस योजना के तहत शामिल होने वाली एयरलाइंस के लिए एक फ्री-ऑन-बोर्ड (FOB) बेंचमार्क कीमत तय की गई है, जो 86 रुपये 32 पैसे प्रति लीटर है। इस आधार कीमत में एयरपोर्ट चार्ज, तेल कंपनियों का मार्जिन और लागू टैक्स जोड़ने के बाद अंतिम बिक्री मूल्य तय होता है। इस हिसाब से दिल्ली में प्रभावी कीमत 115 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 114 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर और चेन्नई में 139 रुपये प्रति लीटर होगी। इसकी तुलना में दिल्ली में पुरानी बाजार कीमत लगभग 105 रुपये प्रति लीटर थी। फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद जब वैश्विक स्तर पर ईंधन के दाम बढ़े थे, तब सरकार ने केवल आंशिक बढ़ोतरी की अनुमति दी थी, जिससे कीमतें दो महीने से अधिक समय तक स्थिर रही थीं और इस स्थिरता के कारण तेल कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा था।

10,000 करोड़ रुपये की प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम

तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई और कीमतों को एक दायरे में रखने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 10,000 करोड़ रुपये की प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम को मंजूरी दी है। इस योजना का मकसद एयरलाइंस को भू-राजनीतिक तनाव के कारण होने वाले नुकसान से बचाना और सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना है। इस तंत्र के तहत, जब भी वैश्विक बेंचमार्क कीमतें 86 रुपये 32 पैसे के बेस रेट से ऊपर जाएंगी, तो सरकार तेल कंपनियों को इस अंतर को पाटने के लिए बिना ब्याज वाला एडवांस देगी। वहीं, जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरेंगी, तो यह अंतर कंपनियों से वापस लेकर भारत के संचित कोष (Consolidated Fund) में जमा कर दिया जाएगा।

ऑपरेटिंग खर्च पर असर और भविष्य की राह

आमतौर पर किसी भी एयरलाइन के कुल ऑपरेटिंग खर्च में जेट फ्यूल (ATF) की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत होती है। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो यह हिस्सा 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। सूत्रों के अनुसार, मई के महीने में अंतरराष्ट्रीय जेट फ्यूल की कीमतें युद्ध से पहले के 60 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर के स्तर से बढ़कर 142 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। इतनी भारी बढ़ोतरी से विमान किरायों में भारी उछाल की आशंका पैदा हो गई थी। सरकार का कहना है कि यह नई व्यवस्था कोई सब्सिडी नहीं है, बल्कि एक अस्थायी स्टेबिलाइजेशन फ्रेमवर्क है। इसका उद्देश्य ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव को कम करना और फंड की पूरी वसूली सुनिश्चित करते हुए जवाबदेही बनाए रखना है।