ग्रीनलैंड पर नियंत्रण को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया भू-राजनीतिक तनाव उभर रहा है, जिसमें चीन ने अमेरिका के रुख का कड़ा विरोध किया है। चीन ने स्पष्ट शब्दों में अमेरिका को चेतावनी दी है कि वह अपने हितों के लिए दूसरे देशों का इस्तेमाल बंद करे और यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है।
ट्रंप का ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का प्रयास
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर नियंत्रण स्थापित करने की जुगत में जोर-शोर से लगे हुए हैं और वेनेजुएला में सैन्य ऑपरेशन के दौरान राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को कथित तौर पर बंधक बनाने के बाद उनका मनोबल काफी बढ़ा हुआ है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण को लेकर कई बयान दिए हैं, जिनका सार यही है कि यदि आपसी बातचीत से अमेरिका का ग्रीनलैंड पर वर्चस्व स्थापित हो जाता है तो ठीक है, अन्यथा वे किसी भी सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने यह भी कहा था कि वह केवल लंबे समय से चले आ रहे उस समझौते पर निर्भर रहने के बजाय पूरे ग्रीनलैंड का स्वामित्व चाहते हैं, जो अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की व्यापक अनुमति देता है। उनका मानना है कि मालिकाना हक वह चीज देता है जो किसी पट्टे या संधि से नहीं मिल सकती, सिर्फ दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से जो नहीं मिलता, वह स्वामित्व से मिलता है। अमेरिका 1951 की एक संधि का पक्षकार है, जिसके तहत उसे डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति से वहां सैन्य अड्डे स्थापित करने के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, ट्रंप अब इससे आगे बढ़कर पूर्ण स्वामित्व चाहते हैं, जो। इस क्षेत्र में अमेरिका के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को दर्शाता है।
चीन का कड़ा विरोध और नसीहत
अमेरिका के इस आक्रामक रुख से चीन भड़क गया है। सोमवार को बीजिंग में जब चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग से ट्रंप के इस बयान के बारे में पूछा गया कि चीन और रूस को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोकने के लिए वाशिंगटन का ग्रीनलैंड पर कब्जा करना जरूरी है, तो उन्होंने कड़ा जवाब दिया और माओ निंग ने साफ तौर पर ट्रंप को यह नसीहत दी कि अमेरिका अपने हितों के लिए दूसरे देशों का इस्तेमाल बंद करे। उन्होंने ग्रीनलैंड का सीधे तौर पर जिक्र किए बिना कहा कि अमेरिका को दूसरे देशों का बहाना बनाकर अपने फायदे नहीं उठाने चाहिए। यह चीन की ओर से एक स्पष्ट संदेश है कि वह आर्कटिक क्षेत्र में किसी भी एकतरफा कार्रवाई या शक्ति प्रदर्शन का समर्थन नहीं करेगा, खासकर जब यह उसके स्वयं के रणनीतिक हितों को प्रभावित करता हो।
आर्कटिक में चीन की गतिविधियां और उसका रुख
माओ निंग ने आर्कटिक में चीन की गतिविधियों के बारे में भी स्पष्टीकरण दिया और उन्होंने कहा कि आर्कटिक में चीन की गतिविधियों का मकसद इस इलाके में शांति, स्थिरता और सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना है और ये इंटरनेशनल कानून के मुताबिक हैं। हालांकि उन्होंने उन गतिविधियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी, लेकिन चीन ने 2018 में इस इलाके में ज्यादा असर डालने की कोशिश में खुद को 'आर्कटिक के पास का देश' घोषित किया था। बीजिंग ने अपने ग्लोबल बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्से के तौर पर पोलर सिल्क रोड बनाने के प्लान की भी घोषणा की है, जिसने दुनिया भर के देशों के साथ इकोनॉमिक लिंक बनाए हैं। यह दर्शाता है कि चीन आर्कटिक को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और रणनीतिक पहुंच के एक महत्वपूर्ण गलियारे के रूप में देखता है।
अंतर्राष्ट्रीय कानून और देशों के अधिकारों का सम्मान
चीन ने इस बात पर जोर दिया है कि आर्कटिक इंटरनेशनल कम्युनिटी के पूरे फायदे से जुड़ा है और माओ निंग ने कहा कि आर्कटिक में कानून के मुताबिक गतिविधियां करने के सभी देशों के अधिकारों और आजादी का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। यह बयान अमेरिका के उस रुख के विपरीत है, जिसमें वह ग्रीनलैंड पर अपने नियंत्रण को चीन और रूस को रोकने के लिए 'जरूरी' बता रहा है और चीन का यह रुख अंतरराष्ट्रीय नियमों और बहुपक्षवाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जबकि साथ ही वह आर्कटिक में अपने स्वयं के बढ़ते प्रभाव को भी वैध ठहराना चाहता है। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे चीन इस संवेदनशील क्षेत्र में बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व
ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व, विशेष रूप से आर्कटिक क्षेत्र में, लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप का ग्रीनलैंड पर पूर्ण स्वामित्व की इच्छा केवल सैन्य ठिकानों के उपयोग से कहीं अधिक है और यह क्षेत्र खनिज संसाधनों से भरपूर है और वैश्विक शिपिंग मार्गों के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु बन सकता है, खासकर जैसे-जैसे आर्कटिक में बर्फ पिघल रही है। अमेरिका का ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का प्रयास इस बात का संकेत है कि वह आर्कटिक में अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना चाहता है, ताकि भविष्य में इस क्षेत्र के संसाधनों और मार्गों पर उसका प्रभाव बना रहे और यह न केवल अमेरिका के लिए, बल्कि चीन और रूस जैसे अन्य वैश्विक शक्तियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति है।
बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
ग्रीनलैंड पर अमेरिका और चीन के बीच यह टकराव आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक स्पष्ट उदाहरण है। एक ओर अमेरिका अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए आक्रामक रुख अपना रहा है, तो दूसरी ओर चीन अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण विकास की बात करते हुए अपने आर्थिक और रणनीतिक पदचिह्न बढ़ा रहा है। यह स्थिति आर्कटिक को वैश्विक शक्ति संघर्ष का एक नया केंद्र बनाती है, जहां देशों के बीच सहयोग और टकराव दोनों की संभावना बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ग्रीनलैंड का भविष्य और आर्कटिक क्षेत्र की भू-राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।