J-10C बनाम ब्रह्मोस: रक्षा बाजार में भारत और चीन के बीच छिड़ी महाजंग

मई 2025 की सैन्य झड़प के बाद वैश्विक हथियार बाजार में भारत की ब्रह्मोस मिसाइल और चीन का J-10C फाइटर जेट आमने-सामने हैं। फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के साथ भारत की पक्की डील ने चीन की चुनौतियों को बढ़ा दिया है।

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सैन्य झड़प के बाद वैश्विक रक्षा बाजार में दो हथियारों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बने रहे। ये दो हथियार हैं चीन का J-10C फाइटर जेट और भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल। पाकिस्तान ने यह दावा किया कि उसके J-10C जेट ने भारतीय राफेल को मार गिराया, जिसके बाद चीन ने इस लड़ाकू विमान को अपनी अब तक की सबसे बड़ी निर्यात सफलता के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। दूसरी ओर, भारत की ब्रह्मोस मिसाइल पहले से ही फिलीपींस जैसे देशों को निर्यात की जा रही थी और अब दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर खाड़ी देशों तक इसकी मांग में भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है। मुख्य सवाल यह है कि पिछले एक साल के दौरान वास्तव में किसे अधिक खरीदार मिले हैं, दोनों की कीमतों में कितना अंतर है और तकनीकी रूप से कौन सा हथियार अधिक शक्तिशाली साबित हो रहा है।

खरीदारों की संख्या और बाजार में पकड़

J-10C के निर्यात के मामले में स्थिति उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी चीन द्वारा पेश की जा रही है। वर्तमान में पाकिस्तान ही इसका एकमात्र पुख्ता और सक्रिय ग्राहक है, जिसने साल 2022 से अब तक 36 जेट अपने वायुसेना बेड़े में शामिल किए हैं। इंडोनेशिया ने अक्टूबर 2025 में 42 जेट खरीदने के लिए लगभग 9 अरब डॉलर के सौदे की घोषणा की थी और बाद में ऑर्डर बढ़ाने की खबरें भी आईं, लेकिन इसकी डिलीवरी की समयसीमा अभी तक तय नहीं हो पाई है। बांग्लादेश ने भी 20 जेट के लिए लगभग 2 अरब 20 करोड़ डॉलर के सौदे पर बातचीत शुरू की थी, लेकिन दिसंबर 2025 तक की रिपोर्टों के अनुसार ढाका का झुकाव यूरोफाइटर टाइफून की ओर भी देखा गया है, जिसका मतलब है कि यह सौदा अभी अधर में लटका हुआ है। मिस्र, उज्बेकिस्तान, ईरान और ब्राजील जैसे कई देशों ने इस जेट का मुआयना तो किया है, लेकिन अभी तक कोई पक्का ऑर्डर नहीं दिया है।

इसके विपरीत, ब्रह्मोस मिसाइल की स्थिति बहुत अधिक ठोस और विश्वसनीय नजर आती है। फिलीपींस ने साल 2022 में ही 37 करोड़ 50 लाख डॉलर की पहली डील साइन की थी, जिसकी डिलीवरी साल 2024 से शुरू हो चुकी है। मार्च 2026 में इंडोनेशिया ने भी ब्रह्मोस खरीदने का औपचारिक ऐलान कर दिया। इसके बाद मई 2026 में वियतनाम के साथ लगभग 62 करोड़ डॉलर का सौदा फाइनल हुआ, जिससे वियतनाम इसे खरीदने वाला दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन गया। इतना ही नहीं, यूएई, थाईलैंड, चिली, मलेशिया और दक्षिण अफ्रीका सहित 14 से ज्यादा देशों ने ब्रह्मोस खरीदने में अपनी गहरी दिलचस्पी दिखाई है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस सूची में रूस का नाम भी शामिल है, जबकि यह मिसाइल रूस के ही तकनीकी सहयोग से विकसित की गई है।

कीमतों का तुलनात्मक विश्लेषण

रिपोर्टों के अनुसार J-10C की बुनियादी कीमत लगभग 4 से 5 करोड़ डॉलर प्रति जेट आंकी जाती है, लेकिन वास्तविक सौदे इससे कहीं अधिक महंगे साबित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया के सौदे में जब हथियार, ट्रेनिंग और सपोर्ट सिस्टम को जोड़ा गया, तो इसकी कीमत लगभग 21 करोड़ डॉलर प्रति जेट तक पहुंच गई। वहीं बांग्लादेश के प्रस्तावित सौदे में यह आंकड़ा लगभग 11 करोड़ डॉलर प्रति जेट बैठता है। इससे पता चलता है कि चीन भले ही इसे कम कीमत पर बेचने का दावा करे, लेकिन पूर्ण परिचालन लागत काफी अधिक है।

ब्रह्मोस की कीमत तय करने का तरीका बिल्कुल अलग है क्योंकि इसे एक अकेली मिसाइल के बजाय पूरे सिस्टम के रूप में बेचा जाता है। इसमें लॉन्चर, कमांड सेंटर और मिसाइलों का एक पूरा पैकेज शामिल होता है, इसलिए इसकी प्रति यूनिट कीमत सार्वजनिक नहीं की जाती है। फिलीपींस का पूरा रक्षा पैकेज 37 करोड़ 50 लाख डॉलर का था, जबकि वियतनाम का सौदा 62 करोड़ डॉलर में तय हुआ। इसका मतलब यह है कि जहां चीन सस्ती कीमत और अधिक संख्या के दम पर बाजार पर कब्जा करने की रणनीति अपना रहा है, वहीं भारत की ब्रह्मोस कम लेकिन ऊंची कीमत वाली हाई-वैल्यू डील के मॉडल पर काम कर रही है।

तकनीकी क्षमता और युद्धक शक्ति

J-10C एक 4 पॉइंट 5 पीढ़ी का मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसमें आधुनिक एईएसए (AESA) रडार और 200 से 300 किलोमीटर तक मार करने वाली पीएल-15 (PL-15) बियॉन्ड-विजुअल-रेंज मिसाइल लगी हुई है। इसकी अधिकतम रफ्तार लगभग मैक 2 पॉइंट 2 है और इसे हवा से हवा तथा हवा से जमीन, दोनों तरह के मिशनों को अंजाम देने के लिए डिजाइन किया गया है। मई 2025 के हवाई संघर्ष में इसके कथित प्रदर्शन ने ही इसे वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया था।

ब्रह्मोस मिसाइल इससे पूरी तरह अलग श्रेणी का हथियार है। इसे दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है, जो मैक 2 पॉइंट 8 से 3 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे जमीन, समुद्र, पनडुब्बी और लड़ाकू विमान, इन चारों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है और यह विविधता खरीदार देशों को एक ही हथियार प्रणाली में कई सामरिक विकल्प प्रदान करती है। इसकी रफ्तार इतनी तेज है कि दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत ही कम समय मिलता है। यही कारण है कि दक्षिण चीन सागर से जुड़े देश अपनी समुद्री सुरक्षा के लिए ब्रह्मोस को विशेष रूप से पसंद कर रहे हैं।

निष्कर्ष के तौर पर, J-10C अभी तक पाकिस्तान से आगे बढ़कर कोई दूसरा पक्का ग्राहक नहीं बना पाया है, हालांकि इंडोनेशिया और बांग्लादेश के साथ बातचीत जारी है। दूसरी ओर, ब्रह्मोस के पास फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम के रूप में तीन बड़े और पक्के ग्राहक मौजूद हैं। साथ ही 14 से अधिक देशों की दिलचस्पी भारत के पक्ष में जाती दिख रही है। जहां चीन संख्या और कीमत के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है, वहीं भारत की ब्रह्मोस अपनी सुपरसोनिक तकनीक और मल्टी-प्लेटफॉर्म क्षमता के दम पर एक प्रीमियम रक्षा निर्यात ब्रांड के रूप में स्थापित हो रही है।