मक्का पर हूती हमले की कोशिश से सऊदी अरब में तनाव, 4 देशों से मांगी सैन्य मदद

मक्का में हूती विद्रोहियों के ड्रोन हमले की कोशिश के बाद सऊदी अरब ने फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से हवाई सुरक्षा के लिए मदद मांगी है। मिसाइल रोकने वाले हथियारों की कमी और अमेरिका के पास घटते स्टॉक के बीच सऊदी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का पर ड्रोन हमले की कोशिश के बाद सऊदी अरब में सुरक्षा को लेकर भारी तनाव देखा जा रहा है। सऊदी अरब के अधिकारियों ने हाल ही में दावा किया था कि उन्होंने मक्का की ओर बढ़ रहे एक हूती ड्रोन को बीच रास्ते में ही मार गिराया है। हालांकि इस हमले को नाकाम कर दिया गया, लेकिन इस घटना ने सऊदी अरब की आंतरिक सुरक्षा और उसकी मिसाइल रक्षा प्रणालियों की सीमाओं को उजागर कर दिया है और यही कारण है कि दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार होने के बावजूद, सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा के लिए चार अन्य देशों की ओर देख रहा है।

चार देशों से हवाई सुरक्षा के लिए विशेष अपील

क्षेत्रीय अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सऊदी अरब ने फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से औपचारिक रूप से मदद की गुहार लगाई है। सऊदी अरब चाहता है कि ये चारों देश इस क्षेत्र में अपनी हवाई सुरक्षा प्रणालियों और सैन्य विशेषज्ञता के माध्यम से उसकी सहायता करें और इस मदद का मुख्य उद्देश्य हूती विद्रोहियों और ईरान समर्थित अन्य समूहों द्वारा दागी जाने वाली मिसाइलों और ड्रोनों को प्रभावी ढंग से रोकना है।

दो क्षेत्रीय अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सऊदी अरब के पास वर्तमान में मिसाइलों को रोकने वाले हथियारों का स्टॉक बहुत कम रह गया है और यमन के हूती विद्रोहियों के साथ पिछले कई वर्षों से चल रहे निरंतर संघर्ष ने सऊदी के रक्षा भंडार को काफी हद तक खाली कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि सऊदी अरब इस समय एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है, जहां उसे अपने सैन्य ठिकानों, महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली तेल सुविधाओं की रक्षा करनी है।

अमेरिका की स्थिति और हथियारों की कमी का संकट

सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय उसका सबसे बड़ा सहयोगी और हथियार आपूर्तिकर्ता देश अमेरिका है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ पिछले छह महीनों से चल रहे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण अमेरिका के पास भी मिसाइल रोकने वाले हथियारों का भंडार काफी कम हो गया है। इस वजह से अमेरिका फिलहाल सऊदी अरब की तत्काल जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ दिख रहा है। हालांकि अमेरिका ने अतीत में सऊदी अरब को अरबों डॉलर के हथियार बेचे हैं, लेकिन वर्तमान संघर्ष में वह सीधे तौर पर शामिल होने से बचता नजर आ रहा है।

सऊदी अरब के सहयोगी देशों ने इस संकट की घड़ी में राजनयिक समर्थन तो दिया है, लेकिन अभी तक किसी भी देश की ओर से प्रत्यक्ष सैन्य सहायता भेजने के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं और सऊदी अरब के लिए अपनी तेल सुविधाओं की सुरक्षा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है, क्योंकि इन पर होने वाला कोई भी हमला वैश्विक तेल बाजार और देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

पाकिस्तान का समर्थन और हूतियों का रुख

मक्का पर हमले के प्रयास की खबर सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस घटना की कड़ी निंदा की और कहा कि पाकिस्तान हर मुश्किल घड़ी में सऊदी अरब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों ने मक्का को निशाना बनाने के सऊदी अरब के दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। हूतियों का कहना है कि उन्होंने मक्का पर कोई हमला नहीं किया है और भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो मक्का यमन की सीमा से लगभग 1100 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके बावजूद, सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि पैगंबर मुहम्मद की जन्मभूमि मक्का उसके लिए एक रेड लाइन है और वह इसकी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। सऊदी अरब का मानना है कि हूतियों और उनके समर्थकों के बढ़ते खतरे को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अब अनिवार्य हो गया है।