मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि सऊदी अरब ने हूती लड़ाकों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अब आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन से सैन्य मदद मांगी है। यह कदम तब उठाया गया है जब सऊदी अरब के पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों जैसे अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्की ने इस मामले में सीधे तौर पर साथ देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब की इस गुहार पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने विचार करने का भरोसा दिया है और इसके साथ ही, ब्रिटेन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए अपने कुछ सैन्य विशेषज्ञों को रियाद भेज दिया है ताकि वे वहां की स्थिति का आकलन कर सकें और रणनीतिक सलाह दे सकें।
पुराने समझौतों और सहयोगियों का रुख
सऊदी अरब के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसने इसी साल पाकिस्तान और तुर्की के साथ मक्का समझौता किया था। इस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि यदि इन तीनों में से किसी भी एक देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा और सभी मिलकर उसका मुकाबला करेंगे। हालांकि, जब हूती लड़ाकों ने हमले तेज किए और सऊदी अरब को मदद की जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान और तुर्की दोनों ने ही सहायता देने से इनकार कर दिया। इससे सऊदी अरब को अपने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
अमेरिका और इजराइल से नहीं मिली मदद
सऊदी अरब के सैन्य संबंध अमेरिका के साथ भी काफी गहरे रहे हैं। हाल ही में अमेरिका ने सऊदी अरब को 44 अरब डॉलर के हथियारों की बिक्री की है। इतने बड़े रक्षा सौदे के बावजूद, जब सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग में अमेरिका से सीधी मदद मांगी, तो वाशिंगटन ने इससे साफ इनकार कर दिया और सऊदी अरब ने इस संकट की घड़ी में इजराइल से भी संपर्क साधा था और मदद की उम्मीद जताई थी, लेकिन तेल अवीव की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। इन परिस्थितियों में ब्रिटेन ही एकमात्र ऐसा देश बनकर उभरा है जिसने सऊदी अरब को मदद का ठोस भरोसा दिया है।
लाल सागर और बाब अल मंडेब का महत्व
सऊदी अरब का मानना है कि हूती लड़ाकों ने लाल सागर को पूरी तरह से घेर लिया है, जो वैश्विक व्यापार के लिए एक गंभीर खतरा है। सऊदी अरब ने ब्रिटेन को चेतावनी दी है कि यदि हूती विद्रोहियों को बाब अल मंडेब के इलाके से नहीं खदेड़ा गया, तो वे सऊदी अरब के महत्वपूर्ण तेल ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं। इससे न केवल सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचेगी, बल्कि पूरी दुनिया में तेल और गैस का व्यापार ठप हो जाएगा। ब्रिटेन के लिए भी यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिटेन का 15 प्रतिशत व्यापार इसी लाल सागर के रास्ते से होता है। ब्रिटेन की तेल और गैस की आपूर्ति इसी मार्ग पर निर्भर है, विशेषकर तब जब होर्मुज का रास्ता पहले से ही बंद है। यदि हूती यहां अपना नियंत्रण मजबूत कर लेते हैं, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
ब्रिटेन और सऊदी अरब के बीच आर्थिक संबंध
ब्रिटेन और सऊदी अरब के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत हैं। दोनों देशों के बीच सालाना लगभग 16 अरब यूरो का व्यापार होता है। आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब से ब्रिटेन को हर साल औसतन 3 अरब यूरो का सामान निर्यात किया जाता है। वहीं, ब्रिटेन से सऊदी अरब को सालाना करीब 12 अरब यूरो का सामान भेजा जाता है। इस बड़े आर्थिक हित को देखते हुए ब्रिटेन ने सऊदी अरब की मदद के लिए कदम बढ़ाए हैं। रियाद भेजे गए सैन्य विशेषज्ञ इस बात का संकेत हैं कि ब्रिटेन अपने व्यापारिक हितों और अपने सहयोगी की सुरक्षा को लेकर गंभीर है।
