दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। एक ओर जहां पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए शांति का दूत बनने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत ने एक अलग कूटनीतिक पिच पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। भारत उन देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित और मजबूत कर रहा है, जिनके साथ हाल के वर्षों में संबंध तनावपूर्ण रहे थे या जो पाकिस्तान के रणनीतिक साझेदार माने जाते हैं। इस सूची में अजरबैजान, बांग्लादेश, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख देश शामिल हैं।
बांग्लादेश के साथ संबंधों का नया अध्याय
बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में एक अनिश्चितता का दौर आया था। हालांकि, अब दोनों देश इन तनावों को पीछे छोड़ते हुए सहयोग का नया मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने हाल ही में भारत का दौरा किया और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। यह यात्रा बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के बाद किसी वरिष्ठ सदस्य की पहली उच्च स्तरीय भारत यात्रा है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को विभिन्न पहलुओं पर मजबूत करने और क्षेत्रीय तथा वैश्विक घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा की है।
तुर्की के साथ कूटनीतिक बर्फ पिघलने के संकेत
भारत और तुर्की के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर मुद्दे और पाकिस्तान को तुर्की के सैन्य समर्थन के कारण काफी तनावपूर्ण रहे थे। लेकिन अब दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। दिल्ली में हाल ही में विदेश कार्यालय परामर्श (FoC) का 12वां दौर आयोजित किया गया। तुर्की के उप विदेश मंत्री बैरिस एकिनसी और भारत की विदेश मंत्रालय सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज के बीच हुई यह बातचीत 2022 के बाद पहली बार हुई है। अधिकारियों के अनुसार, इस वार्ता का उद्देश्य पुराने मतभेदों को दरकिनार कर आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करना है।
अजरबैजान के साथ सहयोग और मानवीय मिशन
अजरबैजान को पारंपरिक रूप से पाकिस्तान का एक मजबूत सहयोगी माना जाता रहा है, विशेष रूप से सैन्य और रणनीतिक मोर्चों पर। हालांकि, हाल के घटनाक्रमों ने भारत और अजरबैजान के बीच एक नई समझ विकसित की है। मिडिल ईस्ट संकट के दौरान ईरान में फंसे 215 भारतीयों को सुरक्षित निकालने में अजरबैजान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने इस मानवीय सहायता के लिए बाकू का औपचारिक रूप से आभार व्यक्त किया है। बाकू में भारत के नवनियुक्त राजदूत अभय कुमार और अजरबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बैरामोव के बीच हुई बैठक इस बात का संकेत है कि दोनों देश अब केवल विवादों के बजाय व्यावहारिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
संयुक्त अरब अमीरात की रणनीतिक यात्रा और क्षेत्रीय स्थिरता
विदेश मंत्री एस जयशंकर 11 से 12 तारीख तक संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के महत्वपूर्ण दौरे पर रहेंगे। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बाद क्षेत्रीय समीकरण बदल रहे हैं। यूएई के साथ भारत की 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' को और गहरा करना इस दौरे का मुख्य एजेंडा है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस यात्रा के दौरान होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते ऊर्जा प्रवाह को सुरक्षित करने, संघर्षविराम की समीक्षा करने और क्षेत्र में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी। यूएई उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिसके संबंध भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संतुलित रहे हैं।
बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की रणनीति
भारत की वर्तमान विदेश नीति स्पष्ट रूप से उन क्षेत्रों में अपनी पैठ मजबूत करने की है जहां पाकिस्तान का प्रभाव रहा है। तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों के साथ जुड़ाव यह दर्शाता है कि नई दिल्ली अब केवल पारंपरिक मित्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन देशों के साथ भी संवाद के द्वार खोल रही है जो पहले उसके रुख के विपरीत खड़े थे। बांग्लादेश में नई सरकार के साथ संबंधों को 'रिसेट' करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि पड़ोसी देश में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सके। यह कूटनीतिक सक्रियता दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में भारत की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
