भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच वैश्विक व्यापार की दिशा बदलने वाला एक ऐतिहासिक समझौता होने जा रहा है और इसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है, क्योंकि यह 18 साल के लंबे इंतजार के बाद हकीकत बनने जा रहा है। आज मंगलवार को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की मौजूदगी में इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की औपचारिकताओं को अंतिम रूप दिया जाएगा।
18 साल का लंबा इंतजार और ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक रिश्तों की यह नई इबारत साल 2007 में शुरू हुई थी। लगभग दो दशकों तक चली जटिल वार्ताओं, कई दौर की बैठकों और कूटनीतिक प्रयासों के बाद आज वह दिन आ गया है जब दोनों पक्ष इस महा-समझौते पर मुहर लगाएंगे। सुबह 11:30 बजे शुरू होने वाले इस शिखर सम्मेलन में द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। दोपहर 1:15 बजे एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य जारी किया जाएगा, जिसमें। इस डील की बारीकियों और भविष्य के रोडमैप का खुलासा होगा।
अमेरिका की नाराजगी और ट्रंप के मंत्री का तीखा हमला
इस डील ने वाशिंगटन में खलबली मचा दी है। डोनाल्ड ट्रंप के आगामी प्रशासन में ट्रेजरी मंत्री नामित किए गए स्कॉट बेसेंट ने इस समझौते पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। एक हालिया इंटरव्यू में बेसेंट ने यूरोपीय संघ को 'धोखेबाज' तक कह डाला। उन्होंने आरोप लगाया कि जब अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर भारत पर दबाव बनाया और टैरिफ की बात की, तो यूरोप ने पीछे से भारत के साथ बड़ी डील कर ली। बेसेंट का तर्क है कि अमेरिका ने वैश्विक स्थिरता के लिए यूरोप से कहीं अधिक कुर्बानी दी है, लेकिन यूरोप अपने आर्थिक हितों के लिए अमेरिका के खिलाफ चल रही 'टैरिफ जंग' को खुद ही फाइनेंस कर रहा है।
क्या है 'मदर ऑफ ऑल डील्स' का आर्थिक गणित?
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' का नाम दिया है। वर्तमान में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार लगभग 137 बिलियन डॉलर का है। इस डील के लागू होने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि द्विपक्षीय व्यापार में 50 बिलियन डॉलर की भारी बढ़ोतरी होगी और आंकड़ों के लिहाज से देखें तो भारत वर्तमान में 27 यूरोपीय देशों को 76 बिलियन डॉलर का सामान निर्यात करता है, जबकि 61 बिलियन डॉलर का आयात करता है। भारत के कुल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत है, जो इस डील के बाद और बढ़ने वाली है।
भारतीय उद्योगों को मिलेगा जबरदस्त बूस्ट
इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का सबसे बड़ा फायदा भारतीय टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, स्टील और मशीनरी सेक्टर को होगा। अब तक इन उत्पादों पर लगने वाले भारी टैरिफ की वजह से। भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था। डील के बाद टैरिफ कम होने से भारतीय सामान सस्ता होगा और मांग बढ़ेगी। इसके अलावा, पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी बड़ी उछाल आने की संभावना है। यह समझौता भारत को ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए जाने वाले संभावित टैरिफ के नुकसान से बचाने में एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा।
यूरोप के लिए भारत क्यों है जरूरी?
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि यूरोपीय देशों के लिए भी यह डील संजीवनी से कम नहीं है। यूरोपीय संघ की ऑटोमोबाइल कंपनियां, वाइन और स्पिरिट निर्माता, और हाई-टेक मशीनरी बनाने वाली कंपनियां लंबे समय से भारतीय बाजार में आसान पहुंच की मांग कर रही थीं। इस समझौते के बाद भारत में यूरोपीय कारों, ऑटो कंपोनेंट्स और प्रीमियम वाइन का आयात आसान हो जाएगा। यह डील न केवल आर्थिक है, बल्कि रणनीतिक भी है, क्योंकि यह दोनों क्षेत्रों की अमेरिका पर निर्भरता को कम करने में मदद करेगी।
वैश्विक कूटनीति में भारत का बढ़ता कद
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील प्रधानमंत्री मोदी की 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' मुहिम को वैश्विक स्तर पर नई पहचान देगी। अमेरिका की नाराजगी के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए यूरोप के साथ हाथ मिलाया है। यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक व्यापार की मेज पर एक ऐसी शक्ति बन चुका है जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए मुमकिन नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका इस डील के जवाब में अपनी व्यापारिक नीतियों में क्या बदलाव करता है।
