युद्ध से प्रभावित गाजा पट्टी में शांति बहाली और पुनर्निर्माण के प्रयासों के बीच, अमेरिका द्वारा गठित 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली आधिकारिक बैठक 19 फरवरी को संपन्न हुई। इस बैठक में भारत ने एक अत्यंत संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाते हुए बतौर 'ऑब्जर्वर' (पर्यवेक्षक) हिस्सा लिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर बनाए गए इस संगठन का मुख्य उद्देश्य गाजा के बुनियादी ढांचे का विकास और अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान करना है और आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत को इस बोर्ड का पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन नई दिल्ली ने फिलहाल केवल पर्यवेक्षक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
बैठक के दौरान वैश्विक शक्तियों के बीच स्पष्ट विभाजन देखने को मिला। जहां एक ओर अमेरिका के नेतृत्व में कई देशों ने गाजा के भविष्य पर चर्चा की, वहीं दूसरी ओर रूस और चीन ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी। भारत का यह कदम उसकी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप माना जा रहा है, जिसमें वह किसी भी गुट का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र और संतुलित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है। इससे पहले 22 जनवरी को दावोस में आयोजित बोर्ड के उद्घाटन समारोह में भी भारत ने हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन 19 फरवरी की बैठक में शामिल होना एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक और भारत की भूमिका
19 फरवरी को आयोजित इस उच्च स्तरीय बैठक में भारत की उपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया। अधिकारियों के अनुसार, भारत ने इस मंच का उपयोग गाजा में मानवीय सहायता और शांति की आवश्यकता पर जोर देने के लिए किया है। हालांकि भारत ने अभी तक इस संगठन की स्थायी सदस्यता स्वीकार नहीं की है, लेकिन पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल होकर उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्र में शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों पर नजर रखेगा। भारत के इस रुख को रणनीतिक स्वायत्तता के रूप में देखा जा रहा है, जहां वह अमेरिका के साथ सहयोग भी कर रहा है और अपनी स्वतंत्र नीति को भी बरकरार रखे हुए है।
प्रमुख देशों की भागीदारी और अनुपस्थिति
इस बैठक में दुनिया भर के करीब 50 देशों और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बोर्ड ऑफ पीस के वर्तमान में 27 सदस्य देश हैं, जिनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), पाकिस्तान, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान और हंगरी जैसे राष्ट्र शामिल हैं। यूरोपीय देशों में जर्मनी, इटली, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और यूनाइटेड किंगडम ने भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी दिखाई। इसके विपरीत, यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल (UNSC) के स्थायी सदस्य रूस और चीन ने इस बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार किया। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी सदस्य के तौर पर इसमें शामिल होने से परहेज किया, जो इस पहल को लेकर वैश्विक शक्तियों के बीच मतभेदों को दर्शाता है।
गाजा पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता और उद्देश्य
अमेरिकी प्रशासन ने गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण के लिए बोर्ड ऑफ पीस के माध्यम से 10 बिलियन डॉलर की भारी-भरकम राशि देने की घोषणा की है। इस फंड का उपयोग युद्ध से तबाह हुए बुनियादी ढांचे, अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण के लिए किया जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, इस बोर्ड का गठन केवल गाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय झगड़ों को सुलझाने के तरीकों को मजबूत करना है। यह संगठन एक ऐसे तंत्र के रूप में कार्य करेगा जो दुनिया भर के संकटग्रस्त क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और शांति स्थापित करने के लिए वित्तीय और कूटनीतिक संसाधन जुटाएगा।
चीन और रूस पर डोनाल्ड ट्रंप का बयान
बैठक के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन की अनुपस्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए भविष्य में उनके शामिल होने की उम्मीद जताई। ट्रंप ने विशेष रूप से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनके चीन के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं और वह आगामी अप्रैल में चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। ट्रंप ने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में चीन और रूस भी इस शांति पहल का हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बोर्ड ऑफ पीस का एक मुख्य कार्य संयुक्त राष्ट्र (UN) की कार्यप्रणाली पर नजर रखना होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपने उद्देश्यों को सही ढंग से पूरा कर रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय विवादों पर बोर्ड का प्रभाव
बोर्ड ऑफ पीस की स्थापना को संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक नए कूटनीतिक ढांचे के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि यह नया बोर्ड अंतरराष्ट्रीय संकटों से निपटने में अधिक प्रभावी साबित होगा और बोर्ड का प्राथमिक ध्यान उन क्षेत्रों पर होगा जहां पारंपरिक कूटनीतिक प्रयास विफल रहे हैं। गाजा के संदर्भ में, यह संगठन न केवल पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा, बल्कि वहां एक स्थायी शांति ढांचा तैयार करने के लिए सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करेगा। भारत जैसे देशों की पर्यवेक्षक के रूप में भागीदारी यह संकेत देती है कि आने वाले समय में इस बोर्ड की भूमिका वैश्विक राजनीति में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
