अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए गए वैश्विक टैरिफ को रद्द कर दिया है। अदालत ने इन शुल्कों को अवैध घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास इस तरह के व्यापक टैरिफ लगाने का संवैधानिक या विधायी अधिकार नहीं है। यह फैसला ट्रम्प प्रशासन की आर्थिक नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी बाधा माना जा रहा है। समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, यह मामला राष्ट्रपति के एजेंडे का पहला प्रमुख मुद्दा था जो सीधे देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा और वहां उसे विफलता का सामना करना पड़ा।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब अप्रैल 2025 में राष्ट्रपति ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामानों पर भारी आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। इन टैरिफ का प्राथमिक उद्देश्य विदेशी सामानों को महंगा बनाना था ताकि घरेलू अमेरिकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सके। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों और व्यापारिक समूहों ने इस कदम को राष्ट्रपति की शक्तियों का दुरुपयोग बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी। अदालत ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यापार नीतियों का निर्धारण मुख्य रूप से कांग्रेस के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) की व्याख्या
इस पूरे कानूनी विवाद के केंद्र में 1977 का इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) है। यह कानून राष्ट्रपति को असाधारण और गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकटों, जैसे युद्ध या विदेशी दुश्मनों से उत्पन्न आर्थिक खतरों के समय विशेष शक्तियां प्रदान करता है। इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति विदेशी लेनदेन को नियंत्रित या प्रतिबंधित कर सकते हैं। ट्रम्प प्रशासन ने इसी कानून का सहारा लेकर वैश्विक टैरिफ लागू किए थे, यह तर्क देते हुए कि व्यापार घाटा एक राष्ट्रीय आपातकाल के समान है और हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया है।
अदालत द्वारा राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा का निर्धारण
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान पाया कि IEEPA कानून के मूल पाठ में 'टैरिफ' शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है। जजों ने टिप्पणी की कि यद्यपि राष्ट्रपति को आपातकालीन स्थितियों में आर्थिक लेनदेन को विनियमित करने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बिना विधायी अनुमति के स्थायी या व्यापक आयात शुल्क लगा सकते हैं। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर स्पष्ट सीमाएं तय करना आवश्यक है ताकि व्यापारिक मामलों में कांग्रेस की संवैधानिक भूमिका बनी रहे। फैसले में यह भी रेखांकित किया गया कि 49 साल पुराने इस कानून का उद्देश्य व्यापार युद्ध शुरू करना नहीं था।
व्यापार घाटे को आपातकाल मानने पर न्यायिक रुख
पिछले साल नवंबर में हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही जजों ने ट्रम्प सरकार के कानूनी आधार पर गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत ने पूछा था कि क्या व्यापार घाटे को एक ऐसी 'आपातकालीन स्थिति' माना जा सकता है जो राष्ट्रपति को असाधारण शक्तियां प्रदान करती है और सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि विदेशी आयात अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। इसके विपरीत, अदालत ने अपने फैसले में कहा कि 150 दिनों तक 15% टैरिफ लगाने जैसे अस्थायी प्रावधानों के लिए भी ठोस और विशिष्ट कारण होने चाहिए, जो इस मामले में पर्याप्त नहीं पाए गए।
आयात शुल्क और घरेलू कंपनियों पर प्रभाव का तर्क
प्रशासन ने टैरिफ लगाने के पीछे यह तर्क दिया था कि इससे अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी और टैरिफ का अर्थ है कि किसी देश से आने वाले सामान पर अतिरिक्त कर लगाया जाए, जिससे वह स्थानीय बाजार में महंगा हो जाए। ट्रम्प प्रशासन का मानना था कि इससे अमेरिकी उपभोक्ता विदेशी सामान के बजाय स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देंगे। हालांकि, अदालत ने इन आर्थिक उद्देश्यों के बजाय कानूनी प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया और अदालत के अनुसार, आर्थिक लाभ की मंशा राष्ट्रपति को उन शक्तियों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देती जो कानूनन उन्हें प्रदान नहीं की गई हैं।
