भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापारिक समझौते ने देश के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित इस समझौते को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर सवालों की बौछार कर दी है। कांग्रेस ने इस सौदे की पारदर्शिता और इसके दूरगामी आर्थिक प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से संसद में स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुरोध पर किया गया है और इसमें भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ को शून्य करने की बात कही गई है।
रूसी तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल
कांग्रेस ने इस समझौते के तहत ऊर्जा आयात की शर्तों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दल का कहना है कि क्या भारत अब रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना बंद कर देगा और कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने बयानों में पूछा है कि क्या मोदी सरकार इस शर्त पर सहमत हो गई है कि वह रूस के बजाय अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदेगी। यूक्रेन संघर्ष के बाद से रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक प्रमुख स्रोत रहा है। कांग्रेस के अनुसार, यदि भारत रूसी तेल से पीछे हटता है, तो इसका सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा और आयात बिल पर पड़ सकता है।
टैरिफ कटौती और घरेलू उद्योगों पर प्रभाव
समझौते के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हुए कांग्रेस ने कहा कि अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ में 32% की कमी करने की बात कही है, लेकिन इसके बदले में भारत को अमेरिकी उत्पादों के लिए अपना बाजार पूरी तरह खोलना पड़ सकता है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने आरोप लगाया कि भारत अमेरिका से 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद और कोयला खरीदने के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है। विपक्षी दल का तर्क है कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को पूरी तरह खोल दिया जाता है, तो इससे स्थानीय किसानों और छोटे व्यापारियों के हितों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
'मेक इन इंडिया' और रणनीतिक स्वायत्तता की चिंता
कांग्रेस ने इस सौदे के कारण 'मेक इन इंडिया' अभियान के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगाया है। पार्टी का कहना है कि यदि भारत अमेरिका से बड़े पैमाने पर तैयार माल और तकनीक का आयात करता है, तो घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के सरकार के अपने लक्ष्य का क्या होगा और इसके अतिरिक्त, रणनीतिक स्वायत्तता का मुद्दा भी उठाया गया है। मनीष तिवारी के अनुसार, विदेशी व्यापार नीतियों में इस तरह का बड़ा बदलाव भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक निर्णयों को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार को इस ट्रेड डील के सभी विवरण सार्वजनिक करने चाहिए ताकि देश को इसके वास्तविक लाभ और हानि का पता चल सके।
विश्लेषकों का दृष्टिकोण और निष्कर्ष
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संतुलन हमेशा से एक जटिल मुद्दा रहा है। जहां एक ओर अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यातकों को कम टैरिफ का लाभ मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर घरेलू बाजार में अमेरिकी प्रतिस्पर्धा स्थानीय उद्योगों के लिए चुनौती बन सकती है। विपक्षी दल के सवालों ने इस समझौते के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को केंद्र में ला दिया है। फिलहाल, सरकार की ओर से इन विशिष्ट आपत्तियों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर चर्चा का मुख्य विषय बना रहेगा।
Just like the ceasefire, the announcement of the trade deal was also made by US President Trump. It has been stated that the trade deal is being done 'on Modi's request'.
— Congress (@INCIndia) February 3, 2026
• Trump says that India will move to reduce tariff and non tariff barriers against the United States to…
