भारतीय मुद्रा बाजार में बुधवार को एक ऐसा भूचाल आया जिसने निवेशकों की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया नीतियों और विशेष रूप से ग्रीनलैंड को लेकर उनकी जिद ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। इसका सीधा और सबसे घातक असर भारतीय रुपए पर देखने को मिला है और बुधवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 76 पैसे की भारी गिरावट के साथ 91. 73 के स्तर पर बंद हुआ। यह रुपए के इतिहास का अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले दिसंबर 2025 में रुपया 91. 14 के स्तर पर पहुंचा था, लेकिन इस बार की गिरावट ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
करेंसी मार्केट में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी और ग्रीनलैंड को लेकर पैदा हुआ विवाद माना जा रहा है। ट्रंप की इस जिद की वजह से अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ गया है, जिससे नाटो के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे हैं। जब भी वैश्विक स्तर पर इस तरह की भू-राजनीतिक अस्थिरता आती है, तो निवेशक उभरते बाजारों जैसे भारत से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों की ओर भागते हैं और इसके अलावा, घरेलू बाजार में डॉलर की मांग में अचानक आई तेजी ने भी रुपए पर दबाव बढ़ा दिया है।
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली
आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी की है। केवल मंगलवार को ही विदेशी निवेशकों ने 2,938. 33 करोड़ रुपए के शेयर बेचे। अगर इस पूरे महीने की बात करें, तो अब तक 30,345 करोड़ रुपए से ज्यादा की पूंजी भारतीय बाजार से बाहर जा चुकी है। जब विदेशी निवेशक अपना निवेश निकालते हैं, तो वे रुपए को डॉलर में बदलते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता जाता है।
ट्रंप की नीतियां और वैश्विक व्यापार का संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति और टैरिफ को लेकर उनका सख्त रुख इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी के लिए काल साबित हो रहा है। ग्रीनलैंड विवाद ने न केवल यूरोप में तनाव पैदा किया है, बल्कि वैश्विक व्यापारिक संबंधों को भी अस्थिर कर दिया है। कोटक महिंद्रा एएमसी के विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक भू-राजनीतिक जोखिम कम नहीं होते और भारत-अमेरिका के बीच। लंबित व्यापार समझौता पूरा नहीं होता, तब तक रुपया इसी तरह के बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहेगा।
शेयर बाजार और कच्चे तेल की स्थिति
रुपए की गिरावट का असर घरेलू शेयर बाजार पर भी साफ दिखा। सेंसेक्स 270. 84 अंक गिरकर 81,909. 63 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी में 75 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी राहत देखी गई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल 1. 88 प्रतिशत गिरकर 63 और 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट रुपए के लिए अच्छी खबर होती है, लेकिन इस बार डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक तनाव इतने हावी हैं कि तेल की सस्ती कीमतों का लाभ रुपए को नहीं मिल पा रहा है।
क्या होगा आम आदमी पर असर?रुपए के इस सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचने का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामान आयात करता है और डॉलर महंगा होने से इन चीजों का आयात महंगा हो जाएगा, जिससे आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के दामों में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा, जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए फीस भरना और वहां रहना अब और भी खर्चीला हो जाएगा। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जिससे उम्मीद की जा रही है कि केंद्रीय बैंक स्थिति को संभालने के लिए हस्तक्षेप करेगा।