ईरान युद्ध: इटली और तुर्की समेत इन देशों ने अमेरिका का साथ छोड़ा

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच इटली, तुर्की और स्पेन जैसे प्रमुख सहयोगियों ने अमेरिकी सैन्य अभियानों को समर्थन देने से इनकार कर दिया है। इन देशों ने न केवल सैन्य भागीदारी से दूरी बनाई, बल्कि अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल पर भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी से जारी सैन्य तनाव के बीच वैश्विक कूटनीति में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अमेरिका के कई पारंपरिक सहयोगियों और नाटो सदस्य देशों ने इस युद्ध में वाशिंगटन का साथ देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है और इन देशों ने न केवल अपनी सेना भेजने से मना किया है, बल्कि अमेरिकी लड़ाकू विमानों और रसद आपूर्ति के लिए अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों के उपयोग पर भी रोक लगा दी है। इस घटनाक्रम ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य अभियानों की रणनीतिक योजना को प्रभावित किया है और आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इटली, तुर्की और स्पेन जैसे देशों ने संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता का हवाला देते हुए अमेरिका के सैन्य अनुरोधों को ठुकरा दिया है।

इटली का कड़ा रुख और हवाई क्षेत्र पर पाबंदी

इटली सरकार ने हाल ही में मध्य पूर्व की ओर जा रहे एक अमेरिकी सैन्य विमान को सिसली में उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया और इस विमान ने सिगोनेला एयर बेस पर लैंडिंग की अनुमति मांगी थी, जो भूमध्य सागर में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र है। इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो के आधिकारिक बयान के अनुसार, लैंडिंग से पहले कोई औपचारिक अनुमति नहीं मांगी गई थी और इटली के सैन्य कमांड से आवश्यक परामर्श नहीं किया गया था। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि विमानों के हवा में होने के दौरान ही उड़ान योजना की सूचना दी गई थी, जो स्थापित प्रोटोकॉल का उल्लंघन है। इटली के अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि यह उड़ान इटली और अमेरिका के बीच मौजूदा द्विपक्षीय संधि के तहत आने वाली नियमित या रसद उड़ानों की श्रेणी में नहीं थी। नाटो का एक प्रमुख सदस्य होने के बावजूद इटली का यह निर्णय अमेरिका के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।

तुर्की की मध्यस्थता और नाटो के भीतर मतभेद

तुर्की ने नाटो का सदस्य होने के बावजूद इस संघर्ष में सीधे सैन्य भागीदारी के बजाय मध्यस्थ की भूमिका को प्राथमिकता दी है और तुर्की के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे ईरान में किसी भी प्रकार के विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। तुर्की वर्तमान में दोनों देशों के बीच संदेशवाहक के रूप में कार्य कर रहा है और उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार तत्काल युद्ध विराम की अपील की है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयर एर्दोगन ने अपने आधिकारिक संबोधन में कहा कि यह युद्ध क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा है और इसकी मानवीय कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ रही है। तुर्की ने अपने हवाई क्षेत्र के सैन्य उपयोग पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे अमेरिका के लिए उत्तरी मार्ग से ईरान तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

स्पेन का सैन्य अड्डों के इस्तेमाल से इनकार

स्पेन ने ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियानों में शामिल अमेरिकी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र पूरी तरह से बंद कर दिया है। स्पेन की रक्षा मंत्री मार्गरीटा रोबल्स ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि अमेरिकी सेना को यह स्थिति संघर्ष की शुरुआत में ही स्पष्ट कर दी गई थी। स्पेनिश प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद इसकी कड़ी निंदा की थी और घोषणा की थी कि स्पेनिश सैन्य अड्डों का उपयोग संयुक्त सैन्य अभियानों के लिए नहीं किया जा सकता है और स्पेन का यह निर्णय यूरोपीय संघ के भीतर युद्ध के प्रति बढ़ते विरोध को दर्शाता है। स्पेनिश सरकार ने स्पष्ट किया है कि वे केवल मानवीय सहायता और शांति स्थापना के प्रयासों का समर्थन करेंगे।

ब्रिटेन की सीमित भागीदारी और इराक युद्ध का सबक

ब्रिटेन ने अमेरिका को समर्थन तो दिया है, लेकिन इसे केवल 'रक्षात्मक हमलों' (Defensive Strikes) तक सीमित रखा है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि उनका देश इराक युद्ध जैसी ऐतिहासिक गलतियों को दोहराना नहीं चाहता है। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया कि वह ईरान पर किए गए शुरुआती हमलों में सीधे तौर पर शामिल नहीं था। हालांकि, स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस से अमेरिकी B-52 बॉम्बर विमानों को उड़ान भरते देखा गया है, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे केवल रसद और रक्षात्मक तैयारियों का हिस्सा बताया है। ब्रिटेन का यह संतुलित रुख घरेलू राजनीतिक दबाव और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं का परिणाम माना जा रहा है।

फ्रांस और जर्मनी का कूटनीतिक दबाव

यूरोप की दो सबसे बड़ी शक्तियों, फ्रांस और जर्मनी ने सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने स्पष्ट किया कि बिना युद्ध समाप्ति के किसी भी सैन्य कदम का समर्थन करना उचित नहीं होगा और वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तनाव कम करने की अपील की है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, जापान और कनाडा सहित 7 देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया है। इस बयान में कहा गया है कि वे समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए सहयोग कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए पहली शर्त युद्ध का अंत है। इन देशों ने स्पष्ट किया है कि वे ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव में शामिल होकर वैश्विक ऊर्जा संकट को और गहरा नहीं करना चाहते हैं।

खाड़ी देशों की सतर्कता और क्षेत्रीय प्रभाव