अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनाव से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक मुश्किलें काफी हद तक बढ़ सकती हैं। इस अहम चुनाव में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का भविष्य तय होना है और इस बार सीनेट की कुल 100 सीटों में से 35 सीटों पर चुनाव कराया जा रहा है, जिसमें 33 सीटें नियमित चुनाव और दो सीटें विशेष चुनाव के अंतर्गत शामिल हैं। मौजूदा समय में रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में 53 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 45 सीटें मौजूद हैं। इसके अलावा दो निर्दलीय सांसद डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। ऐसे में सीनेट में रिपब्लिकन बहुमत को कड़ी चुनौती देने के लिए डेमोक्रेट्स को कम से कम चार सीटों का फायदा हासिल करना बेहद जरूरी है, क्योंकि सीनेट में बहुमत का जादुई आंकड़ा 51 सीटों का होता है।
महंगाई और युद्ध जैसे मुद्दों से बदला समीकरण
अमेरिका के 10 राज्यों के यह कड़े मुकाबले सीनेट में सत्ता का पूरा समीकरण तय करने में बहुत ही अहम भूमिका निभा सकते हैं। देश में महंगाई, ईरान के साथ युद्ध, ईंधन और खेती की बढ़ती लागत जैसे गंभीर मुद्दों ने उन राज्यों में भी मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है, जिन्हें पहले से ही रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है और अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है, जबकि संसद यानी कांग्रेस के चुनाव हर दो साल के अंतराल पर होते हैं। राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक बीच यानी दो साल बाद होने वाले इस चुनाव को ही मिडटर्म चुनाव कहा जाता है। इस दौरान संसद के दोनों सदनों की सीटों के लिए मतदान होता है।
मिडटर्म चुनाव की पूरी रूपरेखा और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स
मिडटर्म चुनाव के इस दौर में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों और सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर वोट डाले जाते हैं। सीनेट में अमेरिका के हर राज्य से दो प्रतिनिधि चुने जाते हैं। कुल 100 सदस्यों वाले इस सदन का कार्यकाल 6 साल का होता है। सदन के सभी सदस्यों का चुनाव एक साथ नहीं कराया जाता, बल्कि हर दो साल में करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होते हैं और वहीं दूसरी ओर, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर हर दो साल में चुनाव कराए जाते हैं। वर्तमान स्थिति के अनुसार हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की 214 सीटों पर रिपब्लिकन्स का कब्जा है और 218 सीटों पर डेमोक्रेट्स का दबदबा है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के इन दोनों सदनों या किसी एक सदन में भी बहुमत हासिल करने में सफल हो जाती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपने फैसलों को लागू करना बेहद मुश्किल हो सकता है।
किन 10 राज्यों की सीटों पर है कांटे की टक्कर
जिन 10 राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा अहम माने जा रहे हैं, उनमें से 7 सीटें इस समय रिपब्लिकन पार्टी के पास हैं, जबकि 3 सीटों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा है। इन सभी राज्यों में चुनावी माहौल बेहद गर्म बना हुआ है और हर सीट पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।
- अलास्का: इस राज्य में रिपब्लिकन सीनेटर डैन सुलिवन के सामने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार और पूर्व सांसद मैरी पेल्टोला मैदान में हैं। दिलचस्प बात यह है कि एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार का नाम भी डैन सुलिवन ही है। इस राज्य में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में वोट देते हैं, जिसे रैंक्ड चॉइस वोटिंग प्रणाली कहा जाता है। साल 2024 में राष्ट्रपति ट्रंप ने यह राज्य 13 प्रतिशत वोटों के अंतर से जीता था, लेकिन अक्टूबर महीने में आए सर्वे में पेल्टोला को मामूली बढ़त दिखाई गई है।
- आयोवा और कंसास: आयोवा में रिपब्लिकन सांसद जोनी अर्न्स्ट के चुनाव नहीं लड़ने के कारण यह सीट पूरी तरह खाली है। यहां रिपब्लिकन उम्मीदवार एश्ले हिंसन और डेमोक्रेट जोश ट्यूरेक के बीच कड़ा मुकाबला चल रहा है। वहीं कंसास में रिपब्लिकन सीनेटर रोजर मार्शल के सामने डेमोक्रेट एडम हैमिल्टन अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कंसास का इतिहास यह रहा है कि 1932 के बाद से किसी भी डेमोक्रेट उम्मीदवार ने वहां सीनेट का चुनाव नहीं जीता है। इस बार खेती की बढ़ती लागत, राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ और ईरान युद्ध को लेकर जनता में फैली नाराजगी मुख्य चुनावी मुद्दे बने हुए हैं।
- मेन और नॉर्थ कैरोलिना: मेन राज्य में रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स का मुकाबला डेमोक्रेट ट्रॉय जैक्सन के साथ हो रहा है। इसके अलावा नॉर्थ कैरोलिना में पूर्व गवर्नर रॉय कूपर के सामने रिपब्लिकन पार्टी के माइकल व्हाटली खड़े हैं। खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि इस राज्य में रॉय कूपर की स्थिति काफी मजबूत है। अक्टूबर के चुनावी सर्वे में उन्हें दो अंकों की स्पष्ट बढ़त दिखाई गई है।
- ओहायो और टेक्सास: ओहायो में डेमोक्रेट शेरोड ब्राउन रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन हस्टेड के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। जॉन हस्टेड को उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के सीनेट छोड़ने के बाद इस सीट पर नियुक्त किया गया था। टेक्सास राज्य में डेमोक्रेट जेम्स टालारिको और रिपब्लिकन केन पैक्सटन आमने-सामने की टक्कर में हैं। आपको बता दें कि 1994 के बाद से टेक्सास में कोई भी डेमोक्रेट मिडटर्म चुनाव नहीं जीत पाया है। इसके बावजूद इस बार के सर्वे में टालारिको को मामूली बढ़त या बराबरी पर दिखाया गया है।
- जॉर्जिया, मिशिगन और न्यू हैम्पशायर: जॉर्जिया में डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन ओसॉफ के सामने रिपब्लिकन माइक कॉलिन्स खड़े हैं। मिशिगन में डेमोक्रेट अब्दुल अल-सईद और रिपब्लिकन माइक रोजर्स के बीच जोरदार मुकाबला है। न्यू हैम्पशायर में डेमोक्रेट क्रिस पैपास का मुकाबला पूर्व रिपब्लिकन सीनेटर जॉन सुनुनू से हो रहा है। अक्टूबर के तमाम सर्वे में ओसॉफ, अल-सईद और पैपास को अपने-अपने मुकाबलों में बढ़त हासिल करते हुए दिखाया गया है।
चुनावी चंदे और पैसों की भारी बरसात
इन तमाम मुकाबलों में केवल उम्मीदवारों की व्यक्तिगत लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि चुनावी चंदा और प्रचार पर किया जाने वाला भारी भरकम खर्च भी बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। उदाहरण के लिए टेक्सास राज्य में एलन मस्क ने केन पैक्सटन के समर्थन वाले रिपब्लिकन सुपर पीएसी को 15 करोड़ 80 लाख डॉलर की भारी-भरकम राशि दान में दी है। इसके अलावा ओहायो राज्य में भी दोनों प्रमुख पार्टियों के समर्थक समूहों ने करोड़ों डॉलर पानी की तरह बहाए हैं।
सीनेट में बहुमत मिलने या न मिलने से ट्रंप पर क्या असर पड़ेगा
अमेरिका में राष्ट्रपति के पास देश चलाने की कार्यकारी ताकत होती है, लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार का कानून बनाने और कई बड़े नीतिगत फैसले लेने के लिए संसद के पूर्ण समर्थन की सख्त जरूरत होती है। सीनेट के पास राष्ट्रपति की तमाम नियुक्तियों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और दूसरे बड़े सरकारी पदों पर होने वाली नियुक्तियों को मंजूरी देने या फिर उन्हें रोकने का विशेष अधिकार होता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय संधियों को अपनी मंजूरी देने में भी सीनेट की भूमिका सबसे अहम होती है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति के खिलाफ चलाई जाने वाली महाभियोग की प्रक्रिया में भी सीनेट ही मुकदमे की औपचारिक सुनवाई करती है।
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी सीनेट में बहुमत हासिल करने में कामयाब हो जाती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना बहुत कठिन हो सकता है। उनकी ओर से जिन भी बड़े पदों के उम्मीदवारों के नाम भेजे जाएंगे, उनकी नियुक्तियों में भारी अड़ंगे लग सकते हैं। नए कानूनों और देश के बजट को लेकर भी दोनों पार्टियों के बीच टकराव का स्तर काफी बढ़ सकता है। सीनेट की विभिन्न समितियां सरकार के हर फैसले और कामकाज की गहराई से जांच कर सकती हैं। हालांकि, सीनेट में बहुमत बदलने का सीधा मतलब यह बिल्कुल नहीं होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप अपना पद खो देंगे या उनकी सरकार तुरंत गिर जाएगी और उनका निर्धारित कार्यकाल पूरी तरह जारी रहेगा, लेकिन संसद में विपक्ष का नियंत्रण बढ़ने से उनके हर फैसले पर सवाल उठाने और उन्हें कड़ी चुनौती देने की उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
