अमेरिका में इस वक्त एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ आम अमेरिकी नागरिक पेट्रोल पंप पर बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया की बड़ी तेल कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कूट रही हैं। इसी बीच अमेरिकी संसद की जॉइंट इकोनॉमिक कमेटी के डेमोक्रेट सदस्यों की एक रिपोर्ट ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। सीबीएस न्यूज में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान जंग के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेल व गैस कंपनियों में किए गए निवेश की कीमत में जबरदस्त उछाल आया है। आगामी 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले आई ये रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है।
ट्रंप के तेल पोर्टफोलियो में बंपर उछाल
रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2025 के अंत में ट्रंप के तेल से जुड़े नौ प्रमुख शेयरों की कीमत 12 रुपये 60 पैसे मिलियन से 46 मिलियन डॉलर के बीच थी। अब ये बढ़कर 22 रुपये 50 पैसे मिलियन से 81 रुपये 60 पैसे मिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। एलएसईजी डेटा एनालिटिक्स के हिसाब से पिछले साल के अंत में उनके पास जो शेयर थे, उनकी कीमत में औसतन 43 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कमेटी ने अपनी जांच में पाया कि 28 फरवरी को ईरान जंग शुरू होने के बाद, मार्च से अगस्त के बीच ट्रंप के खातों से 4 रुपये 70 पैसे मिलियन से 17 रुपये 5 पैसे मिलियन डॉलर के नए तेल शेयर खरीदे गए। इस साल उनके कुल तेल शेयरों की खरीदारी का 94 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जंग शुरू होने के बाद ही खरीदा गया। इस दौरान उन्होंने 2 मिलियन से 5 रुपये 40 पैसे मिलियन डॉलर के शेयर बेचे भी हैं। ट्रंप का सबसे बड़ा दांव शेवरॉन यानी 23 रुपये 10 पैसे मिलियन डॉलर तक और एक्सॉनमोबिल यानी 18 रुपये 40 पैसे मिलियन डॉलर तक पर है। 20 फरवरी के बाद से इन दोनों कंपनियों के शेयर करीब 25 और 22 फीसदी तक चढ़ चुके हैं। ये आंकड़े 19 अक्टूबर तक के हैं। सितंबर और अक्टूबर के पूरे लेनदेन सामने आने के बाद ये रकम और बढ़ सकती है।
सीजफायर वाले दिन शेयरों की बिक्री पर व्हाइट हाउस की सफाई
इस रिपोर्ट में 7 अप्रैल के एक खास लेनदेन का भी जिक्र है। इसी दिन शाम को ट्रंप ने ईरान जंग में सीजफायर का ऐलान किया था। जून के अंत में दाखिल वित्तीय दस्तावेजों से पता चलता है कि ठीक इसी दिन ट्रंप के खातों से एक्सॉनमोबिल के 5 लाख से 10 लाख डॉलर के शेयर बेचे गए। उस दिन कंपनी का शेयर 163 रुपये 91 पैसे पर बंद हुआ था। सीजफायर की घोषणा के बाद अगले दिन ये 6 फीसदी से ज्यादा गिरकर 153 रुपये 52 पैसे पर खुला। हालांकि, सीबीएस की रिपोर्ट में ये दावा बिल्कुल नहीं किया गया है कि ट्रंप ने खुद ये शेयर बिकवाए या उन्हें बाजार की चाल का पहले से अंदाजा था। खुद ट्रंप ने भी अगस्त में ओवल ऑफिस से एक्सॉनमोबिल और शेवरॉन की आलोचना करते हुए कहा था कि ये कंपनियां तेल की कमी का फायदा उठाकर जरूरत से ज्यादा पैसा कमा रही हैं। इस पूरे मामले पर व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति का बचाव किया है। प्रवक्ता डेविस इंगल ने साफ कहा कि ट्रंप या उनके परिवार का कोई भी सदस्य ये तय नहीं करता कि कब कौन सा शेयर खरीदना या बेचना है। उनका पोर्टफोलियो बाहरी वित्तीय संस्थानों द्वारा कंप्यूटर मॉडल के जरिए स्वतंत्र रूप से संभाला जाता है, इसलिए इसमें हितों के टकराव का कोई सवाल नहीं है। हालांकि रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि जुलाई 2026 में सीएनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि उनके बेटे एरिक ट्रंप भी उनका वित्तीय कामकाज देखते हैं। अमेरिकी कानून के तहत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सांसदों को पद पर रहते हुए शेयर रखने या बेचने की छूट होती है, बशर्ते इनसाइडर ट्रेडिंग के नियमों का उल्लंघन न हो। फोर्ब्स के मुताबिक सितंबर में ट्रंप की कुल संपत्ति करीब 7 बिलियन डॉलर थी, जिसमें तेल के शेयरों का हिस्सा काफी छोटा है।
पांच बड़ी कंपनियों ने की मोटी कमाई
ईरान जंग और रूस के साथ चल रहे तनाव की वजह से दुनियाभर में ईंधन की सप्लाई गड़बड़ा गई है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन, बीपी, शेल और टोटलएनर्जीज ने तीसरी तिमाही में मिलकर 56 रुपये 30 पैसे बिलियन डॉलर की शुद्ध कमाई की है। ये अब तक की सबसे बड़ी तिमाही कमाई में शुमार है और रॉयटर्स के अनुसार, कम से कम छह सालों में पहली बार एक्सॉनमोबिल ने कच्चा तेल निकालने के बजाय उसे रिफाइन करने से ज्यादा पैसा कमाया है। शेवरॉन की रिफाइनिंग से होने वाली कमाई भी छह साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। एक्सॉनमोबिल ने तीसरी तिमाही में 16 रुपये 60 पैसे बिलियन डॉलर के अनुमान को पीछे छोड़ते हुए 17 रुपये 50 पैसे बिलियन डॉलर का मुनाफा दर्ज किया। इसकी प्रति शेयर कमाई 4 रुपये 08 पैसे के अनुमान के मुकाबले 4 रुपये 23 पैसे रही। वहीं शेल ने 10 रुपये 80 पैसे बिलियन डॉलर और बीपी ने 8 रुपये 46 पैसे बिलियन डॉलर की रिकॉर्ड तिमाही कमाई की। शेल ने अपने शेयर बायबैक प्रोग्राम को भी 3 बिलियन से बढ़ाकर 5 बिलियन डॉलर कर दिया है। अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी EIA के मुताबिक तीसरी तिमाही में अमेरिकी रिफाइनरियों ने अपनी 95 फीसदी क्षमता पर काम किया। पेट्रोल रिफाइनिंग पर मुनाफा पिछले साल के मुकाबले दोगुने से ज्यादा हो गया, जबकि डीजल और जेट फ्यूल पर मार्जिन लगभग तीन गुना बढ़ गया। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के साथ रूस और सऊदी अरब की रिफाइनरियों पर हमलों से ग्लोबल सप्लाई घटी है, जिसका सीधा फायदा अमेरिकी रिफाइनरियों को निर्यात बढ़ाने में मिला है।
महंगे ईंधन से जनता बेहाल, चुनाव पर दिखेगा असर
कंपनियों के इस मुनाफे के बीच आम अमेरिकी परिवारों की जेब कट रही है। फरवरी की शुरुआत में जो पेट्रोल 2 रुपये 87 पैसे प्रति गैलन था, वो बढ़कर 4 रुपये 29 पैसे पर पहुंच गया है। डीजल के दाम 3 रुपये 68 पैसे से उछलकर 6 रुपये 28 पैसे हो गए हैं, जबकि 22 सितंबर को डीजल ने 6 रुपये 52 पैसे का रिकॉर्ड स्तर छू लिया था। जंग शुरू होने के बाद से हर अमेरिकी परिवार को पेट्रोल पर औसतन 856 डॉलर ज्यादा खर्च करने पड़े हैं, जिससे पूरे देश पर 101 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। एएए यानी AAA के आंकड़ों के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पेट्रोल की औसत कीमत 3 रुपये 47 पैसे रही है, जो जो बाइडेन के समय के 3 रुपये 47 पैसे से थोड़ी ज्यादा है। डीजल का औसत भी बाइडेन के 4 रुपये 07 पैसे के मुकाबले 4 रुपये 34 पैसे रहा है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स का कहना है कि मिडिल ईस्ट से तेल का निर्यात सुधरकर 18 अक्टूबर वाले हफ्ते में 24 रुपये 60 पैसे मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुंच गया है, इसलिए जंग रुकते ही कीमतें तेजी से गिरेंगी। वहीं गैस-बडी के एनर्जी एनालिस्ट पैट्रिक डी हान का मानना है कि महंगाई के हिसाब से देखें तो लोग अपनी कमाई का रिकॉर्ड हिस्सा तेल पर खर्च नहीं कर रहे हैं, लेकिन महंगा डीजल खेती और मालढुलाई की लागत बढ़ाकर महंगाई को हवा दे रहा है। आगामी 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों का नियंत्रण तय होना है, जहां पेट्रोल पंप के ये बढ़े हुए दाम वोटरों के मूड को सीधे प्रभावित कर सकते हैं।
