संसद के मानसून सत्र का आधा सफर पूरा हो चुका है और अब सबकी निगाहें सत्र के अंतिम 9 दिनों पर टिक गई हैं। 20 जुलाई से शुरू हुआ यह सत्र 13 अगस्त तक चलेगा। शुरुआती दिनों में पेपर लीक और छात्र आंदोलन को लेकर विपक्ष के भारी हंगामे के बीच सरकार ने एंटी पेपर लीक और वंदे मातरम जैसे महत्वपूर्ण विधेयक तो पारित करा लिए हैं, लेकिन अब असली चुनौती संविधान संशोधन वाले दो बड़े विधेयकों—महिला आरक्षण और परिसीमन—को लेकर बनी हुई है। मुख्य सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार इन ऐतिहासिक बदलावों के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा जुटा पाएगी।
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का गणित
महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है और लोकसभा की कुल 543 सीटों में से वर्तमान में 3 सीटें रिक्त हैं, जिसका अर्थ है कि सदन की प्रभावी संख्या अभी 540 है। इस प्रभावी संख्या के आधार पर किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 360 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी। यह आंकड़ा सरकार के लिए एक बड़ी विधायी चुनौती पेश करता है क्योंकि इसके लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन की जरूरत होती है।
वर्तमान संख्या बल और गठबंधन की स्थिति
अगर मौजूदा सदन के संख्या बल पर विस्तार से नजर डालें तो एनडीए (NDA) के पास 293 सीटें हैं। इसके अलावा, टीएमसी से अलग होकर बनी एनसीपीआई (NCPI) के 20 सांसद सरकार के साथ दिख रहे हैं। शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट के पास 6 सांसद हैं, जबकि वाईएसआरसीपी (YSRCP) और कुछ निर्दलीय सांसदों को मिलाकर 5 और सदस्यों का समर्थन मिलने की उम्मीद है। इस प्रकार, सरकार के पक्ष में कुल समर्थन 324 सांसदों का बैठता है। इस गणना के अनुसार, सरकार अभी भी 360 के जादुई आंकड़े से 36 सांसद दूर है। इन 36 सांसदों का समर्थन जुटाना ही सरकार की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है।
सरकार की रणनीति और क्षेत्रीय दलों की भूमिका
सरकार की कोशिश अब उन क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने की है जो अब तक या तो तटस्थ रहे हैं या विपक्ष के खेमे में नजर आए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि डीएमके और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के रुख पर सरकार की पैनी नजर है। हालांकि, पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विपक्ष के तेवर अभी भी काफी आक्रामक बने हुए हैं। सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि परिसीमन को लेकर पूरी तैयारी कर ली गई है और संख्या बल को लेकर भी काफी हद तक काम पूरा हो चुका है। अब केवल इस बात का इंतजार है कि शीर्ष नेतृत्व इन विधेयकों को सदन के पटल पर रखने का अंतिम फैसला कब लेता है।
सत्र के अंतिम दिनों की अहमियत
मानसून सत्र के अब केवल 9 दिन शेष बचे हैं और इस दौरान एफसीआरए समेत कुछ अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव होने के पूरे आसार हैं। संसद के ये आखिरी दिन राजनीतिक और संसदीय दोनों ही दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या मोदी सरकार दो-तिहाई बहुमत का सटीक गणित साधकर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे ऐतिहासिक विधेयकों को इसी सत्र में पारित करा पाएगी, या फिर इन विधेयकों को एक बार फिर से लंबी प्रतीक्षा सूची में डाल दिया जाएगा। इसका स्पष्ट उत्तर आने वाले सोमवार से शुरू होने वाली संसदीय कार्यवाही में मिल जाएगा।
