भारत के सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग द्वारा जारी दीर्घकालिक अनुमानों के अनुसार, देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले की भूमिका अगले कुछ दशकों तक महत्वपूर्ण बनी रहेगी। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ते रुझान के बावजूद, सदी के मध्य तक भारत में कोयले की खपत वर्तमान स्तर से दोगुनी से अधिक हो सकती है और यह वृद्धि मुख्य रूप से औद्योगिक विस्तार और बिजली की बढ़ती मांग के कारण होने का अनुमान है।
वर्तमान में भारत अपनी बिजली उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा कोयले से प्राप्त करता है। 62 अरब मीट्रिक टन के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगी। 26 अरब मीट्रिक टन है।
वर्तमान नीति परिदृश्य और मांग का अनुमान
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 'बिजनेस-एज-यूजुअल' परिदृश्य में कोयले की मांग में निरंतर वृद्धि देखी जाएगी। 80 अरब टन के उच्च स्तर पर बनी रह सकती है। यह दर्शाता है कि स्टील और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों में कोयले का विकल्प ढूंढना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। बिजली क्षेत्र में कोयले की निर्भरता कम करने के प्रयासों के बावजूद, औद्योगिक मांग कुल खपत को ऊपर बनाए रखेगी।
नेट जीरो 2070 लक्ष्य और खपत में बदलाव
भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस परिदृश्य के तहत, कोयले की खपत का पैटर्न काफी भिन्न होने की उम्मीद है। 83 अरब टन के निचले स्तर पर चरम पर होगी। इसके बाद, 2070 तक इसमें नाटकीय गिरावट आएगी और यह घटकर केवल 161 मिलियन टन रह जाएगी। इस स्तर पर, कोयले का उपयोग केवल उन क्षेत्रों तक सीमित होगा जहां उत्सर्जन को कम करना तकनीकी रूप से कठिन है।
बिजली उत्पादन क्षमता और ग्रिड स्थिरता
भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता है। रिपोर्ट के अनुसार, अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने के लिए देश को 2034-35 तक अपनी कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता को वर्तमान 212 गीगावाट से बढ़ाकर 307 गीगावाट करने की आवश्यकता होगी। विश्लेषकों का मानना है कि सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमताओं के विस्तार के साथ-साथ ग्रिड को संतुलित करने के लिए निकट भविष्य में कोयला आधारित बिजली संयंत्र अनिवार्य बने रहेंगे। ये संयंत्र पीक डिमांड के दौरान सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करेंगे।
ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा
कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर सफलतापूर्वक संक्रमण करने के लिए रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण आवश्यकताओं पर जोर दिया गया है। इसमें बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम का विकास, परमाणु ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि और राष्ट्रीय ग्रिड का व्यापक विस्तार शामिल है। इसके अतिरिक्त, क्लीन टेक्नोलॉजी की लागत को कम करना भी एक प्राथमिकता होगी। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि भविष्य में कई कोयला बिजली संयंत्रों का उपयोग केवल आपातकालीन स्थितियों या बिजली की अत्यधिक मांग के समय ही किया जाएगा, जिससे उनके संचालन के घंटों में कमी आएगी।
विश्लेषकों का दृष्टिकोण और निष्कर्ष
विश्लेषकों के अनुसार, नीति आयोग की यह रिपोर्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच एक जटिल संतुलन को रेखांकित करती है। जहां एक ओर आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक उत्सर्जन मानकों को पूरा करना भी अनिवार्य है। रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि कोयला आने वाले कई वर्षों तक भारत के ऊर्जा ढांचे का आधार बना रहेगा, लेकिन इसका भविष्य कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) जैसी तकनीकों के सफल कार्यान्वयन पर निर्भर करेगा और निष्कर्षतः, भारत का ऊर्जा भविष्य कोयले के कुशल प्रबंधन और वैकल्पिक स्रोतों के त्वरित विस्तार के बीच के तालमेल पर टिका है।
