भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का औपचारिक नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया है और यह कदम विपक्षी दलों द्वारा सदन के संचालन और निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों के बाद उठाया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस नोटिस पर विपक्षी गठबंधन के 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। पार्टी ने यह प्रस्ताव लोकसभा के नियम 94सी के तहत पेश किया है। लोकसभा सचिवालय ने नोटिस मिलने की पुष्टि की है और अब नियमों के अनुसार इसके तकनीकी पहलुओं का आकलन किया जा रहा है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी नेताओं, विशेषकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा है। हालांकि, इस महत्वपूर्ण नोटिस पर राहुल गांधी के हस्ताक्षर नहीं होने की बात भी सामने आई है। सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संवैधानिक और संसदीय नियमों का पालन अनिवार्य है, जिसमें 14 दिनों की पूर्व सूचना और सदन के बहुमत का समर्थन आवश्यक होता है।
विपक्ष के आरोप और अविश्वास प्रस्ताव का आधार
विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिरला पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोका गया। इसके अतिरिक्त, विपक्ष ने सदन में महिला सांसदों के साथ हुए कथित अनुचित व्यवहार और सत्तापक्ष को दी जाने वाली अतिरिक्त छूट को भी प्रस्ताव का आधार बनाया है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए अध्यक्ष को निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है।
सरकार की प्रतिक्रिया और संख्या बल का गणित
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और उन्होंने कहा कि विपक्ष के पास आवश्यक संख्या बल नहीं है और यह प्रस्ताव केवल सदन की कार्यवाही में बाधा डालने का एक प्रयास है। रिजिजू ने आरोप लगाया कि विपक्ष ने स्पीकर के पद का अपमान किया है और सदन के भीतर अमर्यादित आचरण किया है। सरकार का मानना है कि यह प्रस्ताव सदन के पटल पर टिक नहीं पाएगा क्योंकि एनडीए गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि स्पीकर के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने के बजाय विपक्ष को संसदीय मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
भारतीय संसदीय इतिहास में स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास में यह चौथा अवसर है जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। वी और मावलंकर के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाते हुए प्रस्ताव पेश किया था, जो बहस के बाद खारिज हो गया था। इसके बाद 1966 में मधु लिमये ने स्पीकर हुकम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव लाया था, लेकिन 50 सदस्यों का समर्थन न मिलने के कारण इसे अनुमति नहीं मिली। 1987 में सोमनाथ चटर्जी ने स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, जिसे सदन ने बहुमत से अस्वीकार कर दिया था।
संवैधानिक प्रक्रिया और नियम 94सी का विश्लेषण
संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है। इसके अनुसार, अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए कम से कम 14 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य है। इसके बाद, सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए। नियम 94सी के तहत लाए गए इस नोटिस पर अब लोकसभा सचिवालय विचार करेगा। यदि प्रस्ताव को चर्चा के लिए स्वीकार किया जाता है, तो निर्धारित तिथि पर सदन में इस पर बहस होगी और फिर मतदान की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। विश्लेषकों के अनुसार, वर्तमान सदन की संरचना को देखते हुए इस प्रस्ताव का पारित होना चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है।
