टाटा ग्रुप के भीतर एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी संकट खड़ा हो गया है। टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने टाटा संस की बोर्ड बैठक में एन चंद्रशेखरन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर हुई वोटिंग प्रक्रिया को सीधे तौर पर अवैध और शून्य घोषित कर दिया है। नोएल टाटा का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच लंबे समय से चले आ रहे कॉरपोरेट गवर्नेंस नियमों का उल्लंघन करती है और यह स्पष्ट रूप से विश्वासघात का मामला है और इस कदम ने टाटा ग्रुप की टॉप लीडरशिप में प्रशासनिक संतुलन पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं।
वोटिंग प्रक्रिया पर नोएल टाटा के गंभीर सवाल
नोएल टाटा का तर्क है कि टाटा संस के होल्डिंग फ्रेमवर्क में 66 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की सहमति और स्थापित प्रक्रियाओं की अनदेखी करके लिया गया कोई भी निर्णय वैधानिक रूप से अमान्य है। इस विवाद के सार्वजनिक होने से कॉरपोरेट गलियारों में हड़कंप मच गया है। नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड और सभी डायरेक्टर्स को चिट्ठी लिखकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है और उन्होंने मांग की है कि मीटिंग की कार्यवाही को ठीक किया जाए और उसे पब्लिक के सामने रखा जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
कंपनी सेक्रेटरी को लिखा कड़ा पत्र
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड मीटिंग की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति और दूसरे प्रस्तावों पर वोटिंग कुछ खास शर्तों के साथ हुई थी, जिनका बाद में पालन नहीं किया गया। शुक्रवार सुबह टाटा संस के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय को लिखे और सभी डायरेक्टर्स को भेजे गए एक पत्र में टाटा ने कहा कि चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव शुरुआत से ही अमान्य था। उन्होंने मांग की कि कंपनी मीटिंग में हुई घटनाओं के बारे में सार्वजनिक रूप से सुधार जारी करे। टाटा संस के बोर्ड ने 4-1 के बहुमत से चंद्रशेखरन की वापसी के पक्ष में वोट किया था।
वोटिंग के लिए रखी गई तीन महत्वपूर्ण शर्तें
नोएल टाटा का कहना है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति और आईपीओ की तैयारी शुरू करने पर वोटिंग तीन शर्तों के साथ हुई थी और उनका आरोप है कि बोर्ड मीटिंग के बाद टाटा संस द्वारा जारी किए गए पब्लिक स्टेटमेंट में इन सभी शर्तों का उल्लंघन किया गया। पहली शर्त यह थी कि कंपनी सेक्रेटरी इस मामले की स्टडी करेंगे, जरूरी कानूनी राय लेंगे और बोर्ड को सलाह देंगे कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का कौन सा क्लॉज 121 या 118 लागू होगा। दूसरी शर्त यह थी कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को पहले कंपनी की होने वाली सालाना आम बैठक यानी एजीएम में शेयरहोल्डर्स मंजूरी देंगे।
पब्लिक अनाउंसमेंट और गोपनीयता का उल्लंघन
तीसरी शर्त पब्लिक अनाउंसमेंट से जुड़ी थी। नोएल टाटा के अनुसार यह साफ तौर पर तय हुआ था कि जब तक ऊपर बताई गई दोनों शर्तें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक जनता को कुछ भी नहीं बताया जाएगा। नोएल टाटा ने चिट्ठी में कहा कि इसके बावजूद कंपनी ने एक बयान जारी किया है जिसकी मीडिया में काफी चर्चा हुई है। इस बयान में बोर्ड मीटिंग में तय की गई शर्तों का कोई जिक्र नहीं है। इन बातों को देखते हुए उन्होंने कंपनी से लिखित स्पष्टीकरण और पब्लिक करेक्शन जारी करने का अनुरोध किया है। साथ ही यह भी पक्का करने को कहा है कि आगे कोई कदम नहीं उठाया जाएगा और हर चीज का रिकॉर्ड रखा जाएगा।
वोटिंग का गणित और कास्टिंग वोट का मामला
बोर्ड मीटिंग के दौरान नोएल टाटा ने इस कदम के खिलाफ वोट किया था, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया था। टाटा ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी डायरेक्टर्स के अलग-अलग रुख अपनाने के कारण मामला कास्टिंग वोट तक पहुंच गया और इस स्थिति में हरीश मनवानी ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष में अपना वोट दिया, जिससे प्रस्ताव बहुमत से पास हो गया। यह बैठक ऐसे समय में हुई जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने टाटा संस की उस अर्जी को ठुकरा दिया था जिसमें उसने अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग की थी। आरबीआई के इस फैसले का मतलब है कि टाटा संस को लिस्टिंग की शर्त सहित सभी लागू नियमों का पालन करना होगा।
टाटा संस का पक्ष और भविष्य की राह
बैठक के तुरंत बाद टाटा संस ने एक बयान में कहा था कि उसके बोर्ड ने बहुमत से फैसला किया है कि मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर चंद्रशेखरन को पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त किया जाएगा। बयान में यह भी कहा गया कि बोर्ड ने आरबीआई के लागू दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए कदम उठाने और आरबीआई, टाटा ट्रस्ट्स व अन्य स्टेकहोल्डर्स से सलाह लेने का फैसला किया है। हालांकि, एक सीनियर अधिकारी ने नोएल टाटा के पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी डायरेक्टर का बोर्ड के प्रस्तावों पर वोटिंग के लिए शर्तें रखना बहुत ही असामान्य और अभूतपूर्व है। इन घटनाओं ने टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच नियमों की व्याख्या को लेकर एक बड़ा मतभेद पैदा कर दिया है।
