एन चंद्रशेखरन: टाटा संस के चेयरमैन को मिला 5 साल का विस्तार, नोएल टाटा ने जताया विरोध

एन चंद्रशेखरन फरवरी 2027 के बाद भी 5 साल तक टाटा समूह के चेयरमैन बने रहेंगे। टाटा संस के बोर्ड ने उनके तीसरे कार्यकाल को मंजूरी दी है, हालांकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया है।

टाटा समूह के भविष्य और नेतृत्व को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। एन चंद्रशेखरन अब फरवरी 2027 के बाद भी अगले 5 साल तक समूह की कमान संभालेंगे। टाटा संस के बोर्ड ने उनके तीसरे कार्यकाल को अपनी मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब समूह कई बड़े बदलावों और चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। चंद्रशेखरन का नेतृत्व टाटा समूह के लिए एक नई दिशा तय करने वाला माना जा रहा है, लेकिन इस विस्तार के साथ ही समूह के भीतर कुछ मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं।

एन चंद्रशेखरन का तीसरा कार्यकाल

63 साल के एन चंद्रशेखरन पहले टाटा ग्रुप की कमान छोड़ने वाले थे, लेकिन अब उन्होंने अपना फैसला बदल दिया है। टाटा संस के बोर्ड ने उन्हें 5 साल और चेयरमैन बनाए रखने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि फरवरी 2027 में उनका मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद भी चंद्रशेखरन टाटा ग्रुप का नेतृत्व करते रहेंगे। यह टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर उनका तीसरा 5 साल का कार्यकाल होगा। उनकी नियुक्ति का यह फैसला समूह की स्थिरता और निरंतरता को बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है।

नोएल टाटा का विरोध और कानूनी सवाल

खास बात यह है कि इस फैसले पर टाटा ग्रुप के अंदर पूरी सहमति नहीं दिखी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा परिवार के प्रमुख सदस्य नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ अपना वोट दिया है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो इसे समूह का सबसे शक्तिशाली हिस्सा बनाती है। ट्रस्ट्स ने इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से अमान्य बताया है। यह विरोध टाटा संस के बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेद को दर्शाता है, जो आने वाले समय में चंद्रशेखरन के लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन सकता है।

चंद्रशेखरन के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियां

चंद्रशेखरन के सामने आने वाले समय में कई बड़ी और जटिल चुनौतियां हैं। इनमें सबसे प्रमुख एयर इंडिया का घाटा है। एयरलाइन को फिर से मुनाफे में लाना और उसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना एक कठिन कार्य है। इसके अलावा, जगुआर लैंड रोवर (JLR) की कमजोर स्थिति भी समूह के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, जो एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है। इन सबके बीच, टाटा संस बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच के रिश्तों को सामान्य बनाना चंद्रशेखरन की प्राथमिकता होगी, क्योंकि ट्रस्ट्स ही टाटा संस के सबसे बड़े शेयरधारक हैं।

भविष्य की योजनाएं और निवेश

दूसरी तरफ, टाटा ग्रुप चंद्रशेखरन के नेतृत्व में इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर कारोबार में तेजी से निवेश कर रहा है। कंपनी के इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में एप्पल और टेस्ला जैसे बड़े वैश्विक ग्राहक जुड़े हैं, जो समूह की बढ़ती साख का प्रमाण है। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए भी समूह अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है, ताकि भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। इन नए क्षेत्रों में सफलता हासिल करना चंद्रशेखरन के अगले कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

कौन हैं एन चंद्रशेखरन?

एन चंद्रशेखरन का जन्म तमिलनाडु के मोहनूर गांव में हुआ था और वह 6 भाई-बहनों में से एक हैं और उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई तमिल माध्यम के सरकारी स्कूल से की। उनकी सफलता की कहानी कड़ी मेहनत और समर्पण का उदाहरण है और साल 1987 में उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS से अपना करियर शुरू किया और तब से उनका पूरा कॉरपोरेट करियर टाटा ग्रुप में ही रहा है। साल 2009 में उन्हें TCS की कमान मिली और उनके नेतृत्व में TCS भारत की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल हुई। जनवरी 2017 में रतन टाटा ने उन्हें टाटा संस का चेयरमैन चुना। वह टाटा परिवार से बाहर के ऐसे पहले चेयरमैन बने, जो पारसी समुदाय से नहीं आते थे।

काम करने की शैली और पहचान

चंद्रशेखरन अपनी तेज फैसले लेने की क्षमता और बारीकियों पर ध्यान देने के लिए जाने जाते हैं। वह बड़े कारोबारी फैसलों के साथ-साथ छोटी-छोटी जानकारियों पर भी पैनी नजर रखते हैं। उनकी एक बड़ी पहचान यह भी है कि वह अपनी कंपनियों के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर को काम करने की पूरी स्वतंत्रता देते हैं। उनका मानना है कि नेतृत्व तभी सफल होता है जब टीम को अपनी क्षमता दिखाने का पूरा मौका मिले। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में टाटा समूह की विभिन्न कंपनियों ने अपनी अलग पहचान बनाई है।