पाकिस्तान रक्षा मंत्री: अमेरिका ने हमारा इस्तेमाल कर टॉयलेट पेपर की तरह फेंका

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में अमेरिका के साथ संबंधों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और बाद में छोड़ दिया। आसिफ ने आतंकवाद और सैन्य तानाशाहों की गलतियों को देश की वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बुधवार को नेशनल असेंबली में एक विवादास्पद और तीखा बयान देते हुए अमेरिका के साथ देश के ऐतिहासिक संबंधों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने वैश्विक और क्षेत्रीय हितों को साधने के लिए पाकिस्तान का केवल एक उपकरण के रूप में उपयोग किया। आसिफ ने एक कड़े रूपक का प्रयोग करते हुए कहा कि जब अमेरिका का मतलब निकल गया, तो उसने पाकिस्तान को 'टॉयलेट पेपर' की तरह फेंक दिया और यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।

रक्षा मंत्री ने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में दो प्रमुख युद्धों में सक्रिय रूप से भाग लिया, लेकिन यह भागीदारी राष्ट्रीय हित के बजाय व्यक्तिगत सत्ता को बनाए रखने के लिए थी और उन्होंने स्पष्ट किया कि इन युद्धों में इस्लाम और धर्म के नाम पर भागीदारी दिखाई गई थी, लेकिन वास्तव में यह दो सैन्य तानाशाहों—जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ—की वैश्विक शक्तियों का समर्थन हासिल करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। आसिफ के अनुसार, इन फैसलों की भारी कीमत आज पाकिस्तान की आम जनता को चुकानी पड़ रही है।

सैन्य तानाशाहों की भूमिका और ऐतिहासिक गलतियां

ख्वाजा आसिफ ने 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में हस्तक्षेप का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय की अफगान सरकार ने सोवियत सेना को आमंत्रित किया था। हालांकि, अमेरिका ने इसे एक सीधे हमले के रूप में चित्रित किया और पाकिस्तान को इस संघर्ष में धकेलने के लिए एक विशेष नरेटिव तैयार किया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन सैन्य शासक जिया-उल-हक ने अपनी सत्ता को वैधता प्रदान करने के लिए अमेरिका का साथ दिया। इसी तरह, 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद, जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक फोन कॉल पर अमेरिका की शर्तों को स्वीकार कर लिया, जिससे पाकिस्तान एक ऐसे युद्ध का हिस्सा बन गया जो उसका अपना नहीं था।

मंत्री ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान ने अपने इतिहास से कोई ठोस सबक नहीं सीखा है। उन्होंने आलोचना करते हुए कहा कि देश अपने तात्कालिक और छोटे लाभों के लिए कभी अमेरिका, कभी रूस और कभी ब्रिटेन की ओर झुकता रहा है। आसिफ ने चिंता व्यक्त की कि आज इन विदेशी शक्तियों का पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में प्रभाव 30-40 साल पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है। उन्होंने स्वीकार किया कि पाकिस्तान का एक जटिल आतंकी इतिहास रहा है और वर्तमान में देश जिस आतंकवाद का सामना कर रहा है, वह उन्हीं पुरानी रणनीतिक गलतियों का सीधा परिणाम है।

शिक्षा प्रणाली में बदलाव और वैचारिक प्रभाव

आसिफ ने एक महत्वपूर्ण दावा करते हुए कहा कि अफगानिस्तान में लड़े गए युद्धों को सामाजिक और धार्मिक रूप से सही ठहराने के लिए पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली में जानबूझकर बड़े बदलाव किए गए थे। उन्होंने कहा कि छात्रों के मन में एक विशिष्ट विचारधारा भरने के लिए पाठ्यक्रम को संशोधित किया गया, ताकि युद्ध के लिए जनसमर्थन जुटाया जा सके। उनके अनुसार, ये बदलाव आज भी देश के सिस्टम में गहराई से मौजूद हैं और समाज में कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को हुए इस वैचारिक और सामाजिक नुकसान की भरपाई करना लगभग असंभव है।

द्विपक्षीय संबंधों की प्रकृति पर बात करते हुए आसिफ ने साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की इस्लामाबाद यात्रा का उदाहरण दिया। उन्होंने याद दिलाया कि क्लिंटन भारत के विस्तृत दौरे के बाद केवल कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान रुके थे। आसिफ के अनुसार, यह घटना दर्शाती है कि अमेरिका के लिए पाकिस्तान के साथ रिश्ता केवल एक 'लेन-देन' (Transactional) तक सीमित था। उस समय अमेरिका ने सैन्य शासक मुशर्रफ पर लोकतंत्र की बहाली, परमाणु अप्रसार और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए भारी दबाव डाला था, जो एक संप्रभु राष्ट्र के लिए अपमानजनक स्थिति थी।

आतंकवाद के विरुद्ध राजनीतिक एकजुटता की अपील

रक्षा मंत्री का यह बयान इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद पर हुए भीषण आत्मघाती हमले के खिलाफ संसद में निंदा प्रस्ताव पारित होने के दौरान आया। 6 फरवरी को हुए इस हमले में 31 लोगों की जान चली गई थी और 169 लोग घायल हुए थे, जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने ली है। आसिफ ने इस बात पर दुख जताया कि आतंकवाद जैसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर भी देश में राजनीतिक एकजुटता का अभाव है। उन्होंने उन नेताओं की आलोचना की जो राजनीतिक मतभेदों के कारण पीड़ितों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। उन्होंने कहा कि जब तक देश एक पहचान और एक उद्देश्य पर एकजुट नहीं होगा, तब तक आतंकवाद से लड़ना कठिन होगा।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और वैश्विक संदर्भ

भू-राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ख्वाजा आसिफ का यह बयान पाकिस्तान की विदेश नीति में आ रहे संभावित बदलाव या कम से कम अमेरिका के प्रति बढ़ती हताशा को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अब अपनी पिछली 'प्रॉक्सि वॉर' नीतियों के दुष्परिणामों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहा है। हालांकि, विश्लेषक यह भी रेखांकित करते हैं कि अमेरिका के साथ संबंधों में यह कड़वाहट नई नहीं है, लेकिन एक कैबिनेट मंत्री द्वारा 'टॉयलेट पेपर' जैसे शब्दों का प्रयोग कूटनीतिक स्तर पर तनाव को बढ़ा सकता है।

दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयानों ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। रुबियो ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन भारत की कीमत पर नहीं। विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका की यह 'इंडिया-फर्स्ट' नीति पाकिस्तान के नेतृत्व को असहज कर रही है। वर्तमान परिस्थितियों में, पाकिस्तान के लिए अपनी आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी शक्तियों पर अपनी निर्भरता कम करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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