अमेरिका को धोखा? पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच 'इस्लामिक नाटो' पर बनी सहमति

पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की आड़ में सऊदी अरब, तुर्की और कतर के साथ मिलकर 'इस्लामिक नाटो' के गठन की तैयारी कर ली है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के अनुसार, यह समझौता अंतिम चरण में है, जो मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा ईरान के साथ परमाणु समझौता कराने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन अब इस मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को इस मध्यस्थता के लिए चुना था, जिसके तहत पाकिस्तान लगातार सऊदी अरब, कतर और तुर्की जैसे देशों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें कर रहा था। पाकिस्तान इन बैठकों को आधिकारिक तौर पर ईरान और अमेरिका के बीच समझौते तक पहुंचने का एक प्रयास बता रहा था और हालांकि, अब जो जानकारी सामने आई है, वह अमेरिका के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखी जा रही है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने खुलासा किया है कि इन लगातार बैठकों के परिणामस्वरूप अब एक 'इस्लामिक नाटो' के गठन पर सहमति बन गई है और इसका औपचारिक ऐलान किसी भी समय किया जा सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की आड़ में कूटनीति

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु गतिरोध को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ की भूमिका दी गई थी। इस प्रक्रिया के दौरान पाकिस्तान ने चीन, सऊदी अरब, तुर्की और कतर जैसे प्रभावशाली देशों के साथ कई दौर की वार्ताएं कीं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और तुर्की के साथ रक्षा संबंधी समझौतों पर चर्चा अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इन समझौतों पर जल्द ही हस्ताक्षर होने की संभावना है और इस पहल को अमेरिका के लिए एक रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि मध्य पूर्व के अधिकांश देश पारंपरिक रूप से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी तंत्र पर निर्भर रहे हैं। अब एक स्वतंत्र 'इस्लामिक नाटो' का विचार इस क्षेत्रीय समीकरण को पूरी तरह से बदल सकता है।

पाकिस्तानी बेस पर ईरानी विमानों को छिपाने का खुलासा

सीबीएस न्यूज की एक रिपोर्ट ने इस पूरे मामले में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जब जंग की स्थिति बनी हुई थी, तब पाकिस्तान ने अपने सैन्य ठिकानों पर ईरान के विमानों को छिपाकर रखा था। सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से इस बात का खुलासा हुआ है कि इन विमानों को अमेरिका और इजराइल के संभावित हमलों से बचाने के लिए पाकिस्तान के बेस पर सुरक्षित स्थान दिया गया था। इस खुलासे के बाद डोनाल्ड ट्रंप के करीबी अमेरिकी सांसद लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान पर अमेरिका को धोखा देने का सीधा आरोप लगाया है। हालांकि, पाकिस्तान सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे निराधार बताया है।

ग्वादर पोर्ट समझौता और रणनीतिक प्रभाव

पाकिस्तान और ईरान के बीच हाल ही में ग्वादर पोर्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत ईरान को अपने सामान को ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से भेजने या बेचने की अनुमति दी गई है और यह कदम अमेरिका के लिए एक और बड़ा झटका है, क्योंकि अमेरिका ने पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर ईरानी जहाजों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कर रखी है। ग्वादर पोर्ट का उपयोग करके ईरान इन अमेरिकी प्रतिबंधों और कार्रवाइयों से बचने का एक वैकल्पिक मार्ग खोजने में सफल हो सकता है।

इस्लामिक नाटो की आवश्यकता और पाकिस्तान का आर्थिक हित

कतर के पूर्व प्रधानमंत्री हमद बिन थानी ने इस नए गठबंधन की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि इजराइल वर्तमान में मिडिल ईस्ट के पूरे ढांचे को बदलने की कोशिश कर रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए एक 'गल्फ नाटो' या 'इस्लामिक नाटो' की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक विशेष समझौता किया था, जिसके तहत सऊदी अरब को पाकिस्तान से परमाणु सुरक्षा की गारंटी प्राप्त हुई थी। पाकिस्तान अब इसी सुरक्षा ढांचे को पूरे मिडिल ईस्ट में विस्तारित करने की योजना पर काम कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरियां भी एक बड़ा कारण मानी जा रही हैं और पाकिस्तान वर्तमान में 10 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा के विदेशी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। उसे उम्मीद है कि सऊदी अरब, कतर और तुर्की जैसे देशों के साथ इस तरह के रक्षा और सुरक्षा समझौते करने के बदले में उसे बड़ी वित्तीय सहायता प्राप्त होगी। इस प्रकार, पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका के साथ मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, तो दूसरी तरफ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को साधने के लिए पर्दे के पीछे एक अलग खेल खेल रहा है।