ट्रंप के चक्रव्यूह में फंसा पाकिस्तान, अब्राहम समझौते पर अमेरिका ने बढ़ाया भारी दबाव

पाकिस्तान इस समय एक बड़ी कूटनीतिक मुसीबत में है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने उसे अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए मजबूर किया है। शहबाज सरकार के सामने संकट यह है कि वह अपनी इस्लामिक विचारधारा बचाए या अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक मदद।

पाकिस्तान के सामने इस समय इधर कुंआ और उधर खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कर्ज चुकाए या फिर अमेरिका से दुश्मनी मोल ले और इस संकट का संकेत तीन दिन पहले ट्रंप के करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी दिया था, जिन्होंने पाकिस्तान की मध्यस्थ वाली भूमिका को समस्याग्रस्त करार दिया था। अमेरिका का खास बनने की कोशिश में पाकिस्तान अब एक ऐसी मुसीबत में फंस चुका है, जिससे बाहर निकलना फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। अब्राहम अकॉर्ड को लेकर ट्रंप का यह दबाव इस्लामाबाद से लेकर वॉशिंगटन डीसी तक पाकिस्तान को घेर रहा है।

दोहरे निशाने साधने की कोशिश में फंसा पाकिस्तान

खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है और इस बहाने पाकिस्तान दो निशाने साधना चाहता है। पहला यह कि किसी भी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश करके अपने लिए और अधिक कर्ज का इंतजाम किया जाए ताकि कंगाल हो चुके मुल्क की अर्थव्यवस्था चल सके और दूसरा निशाना यह है कि खुद पर लगे आतंकी मुल्क के दाग को मिटाकर दुनिया के सामने एक शांतिदूत की छवि बनाई जाए। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इसी बीच अब्राहम अकॉर्ड का ऐसा ट्रंप कार्ड चल दिया है, जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस गया है। ट्रंप की ओर से सऊदी अरब और पाकिस्तान पर इस समझौते में शामिल होने का भारी दबाव है।

वॉशिंगटन में इशाक डार से तीखे सवाल

पाकिस्तान के डिप्टी पीएम इशाक डार को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा जब वह वॉशिंगटन डीसी में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद जब वह मीडिया से मिले, तो उनसे इजरायल को मान्यता देने पर सवाल पूछा गया। डार ने बाद में स्पष्ट किया कि 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और अल कुद्स अल शरीफ को उसकी राजधानी बनाए बिना पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी रही है और साल दर साल इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

राजनीतिक आत्महत्या और आर्थिक संकट का डर

अब्राहम अकॉर्ड पाकिस्तान के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। इसमें शामिल होने का मतलब मुनीर और शहबाज के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा होगा, क्योंकि इसके लिए उन्हें फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी इस्लामिक विचारधारा को छोड़ना होगा और पाकिस्तान ने जिस इजरायल को गाजा, लेबनान और ईरान में मौतों का जिम्मेदार माना है, उसे एक देश के रूप में मान्यता देना जनता के बीच भारी विरोध का कारण बनेगा। कट्टरपंथी संगठनों का गुस्सा सरकार और सेना पर फूट सकता है और लेकिन अगर पाकिस्तान इस समझौते से दूर रहता है, तो उसे ट्रंप के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। इससे अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक मदद बंद हो सकती है और हाफिज सईद व मसूद अजहर जैसे आतंकियों पर कार्रवाई का दबाव बढ़ सकता है।

ट्रंप की चेतावनी और समझौते का भविष्य

डोनाल्ड ट्रंप ने दो दिन पहले स्पष्ट रूप से कहा था कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देश इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने के लिए अमेरिका के कर्जदार हैं और उन्होंने कहा कि विटकॉफ, जेरेड और अन्य लोग इस ऐतिहासिक समझौते पर काम कर रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि ये देश तुरंत इस समझौते में शामिल हों ताकि खाड़ी में अमेरिका का सैन्य खर्च कम हो सके। दूसरी ओर, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि पाकिस्तान अपनी मूल विचारधारा से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए वैध नहीं है। वर्ष 2020 में शुरू हुए इस अब्राहम अकॉर्ड में यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान पहले ही शामिल हो चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान के लिए यह मुद्दा अब गले की फांस बन गया है।