प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंच चुके हैं, जहां वह शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होने वाली उनकी द्विपक्षीय बैठक है। यह शिखर सम्मेलन एक ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक भू-राजनीति तेजी से बदल रही है और पूरी दुनिया की नजरें पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित मुलाकात पर टिकी हैं। दो दिवसीय इस सम्मेलन में सदस्य देशों के नेता यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के साथ-साथ सुरक्षा और आर्थिक सहयोग पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए हैं।
एससीओ शिखर सम्मेलन का रणनीतिक महत्व
इस वर्ष एससीओ अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है, जिससे बिश्केक की यह बैठक एक ऐतिहासिक अवसर बन गई है। भारत के लिए यह बैठक 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की कूटनीतिक तैयारी के रूप में देखी जा रही है। पुतिन और शी दोनों के दिल्ली सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है, इसलिए बिश्केक में होने वाली चर्चाएं एजेंडा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी और पुतिन के साथ औपचारिक बैठक तय है, लेकिन शी जिनपिंग के साथ मुलाकात की संभावना पर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर है। पीएम मोदी ने एससीओ को एक महत्वपूर्ण संगठन बताते हुए कहा कि भारत 2017 से इसका एक सक्रिय सदस्य रहा है। उन्होंने सुरक्षा, संपर्क और अवसर पर आधारित क्षेत्र के लिए भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है।
पश्चिम एशिया युद्ध और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा
शिखर सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। ईरान के एससीओ का पूर्ण सदस्य होने के कारण इन चर्चाओं का महत्व और बढ़ गया है। पीएम मोदी ने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से मुक्त क्षेत्र की आवश्यकता पर जोर दिया है, जो भारत के पड़ोस और उससे आगे की शांति के लिए खतरा बने हुए हैं। एससीओ में भारत की प्राथमिकताएं सिक्योर (SECURE) ढांचे पर आधारित हैं, जिसे 2018 के शिखर सम्मेलन में समर्थन दिया गया था। इसका अर्थ है सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और व्यापार, कनेक्टिविटी, एकता, और संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान। इस साल फरवरी में ईरान पर हुए हमलों के बाद संप्रभुता का मुद्दा वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है।
कनेक्टिविटी और कूटनीतिक संतुलन
भारत के लिए ईरान के माध्यम से मध्य एशिया के साथ कनेक्टिविटी एक प्रमुख प्राथमिकता रही है। बिश्केक में ईरान, सऊदी अरब और यूएई एक साथ मौजूद होंगे, जो भारत के लिए पश्चिम एशिया युद्ध पर आम सहमति बनाने का एक बड़ा अवसर है। इससे पहले मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई थी। इसके अलावा, पाकिस्तान की उपस्थिति भी इस बैठक को चुनौतीपूर्ण बनाती है। भारत ने हमेशा आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ अपनी सख्त नीति को सामने रखा है और यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल इन मुद्दों को कैसे उठाता है।
बिश्केक घोषणापत्र और भविष्य के समझौते
इस शिखर सम्मेलन में लगभग 27 दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जाने या उन्हें अपनाने का प्रस्ताव है। इनमें बिश्केक घोषणापत्र, एससीओ चार्टर में संशोधन के प्रोटोकॉल, और जलवायु परिवर्तन, सूचना क्षेत्र व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े समझौता ज्ञापन (MoU) शामिल हैं और इसके अलावा, अपराध से निपटने, एंटी-ड्रग सेंटर के नियमों और अफ्रीकी संघ के साथ सहयोग से जुड़े दस्तावेजों पर भी चर्चा होगी। भारत ने 2020 में एससीओ काउंसिल ऑफ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट और 2022-2023 के दौरान काउंसिल ऑफ हेड्स ऑफ स्टेट की अध्यक्षता की है। भारत का ध्यान हमेशा मध्य एशिया पर रहा है, लेकिन यहां ताजिकिस्तान के साथ एक कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है, क्योंकि ताजिकिस्तान ने 2028-29 के लिए यूएनएससी की अस्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी पेश की है, जिसके लिए भारत भी मैदान में है।
एससीओ का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी
इस वर्ष एससीओ प्लस फॉर्मेट की तीसरी बैठक भी आयोजित की जा रही है। इसमें सदस्य देशों के अलावा अजरबैजान, आर्मेनिया, वियतनाम, लाओस, मंगोलिया, टोगो, तुर्की, मिस्र और तुर्कमेनिस्तान के शामिल होने की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र (UN), सीआईएस (CIS), सीएसटीओ (CSTO) और ईईसी (EEC) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी इसमें हिस्सा लेंगे। इस वर्ष की थीम एससीओ की 25वीं वर्षगांठ: स्थिरता को मजबूत करना और संयुक्त विकास के लिए सहयोग बढ़ाना है। पीएम मोदी ने किर्गिज राष्ट्रपति सदिर झापारोव से मिलने और मध्य एशिया की समृद्ध विरासत का जश्न मनाने वाले खेलों के उद्घाटन समारोह में शामिल होने की भी इच्छा जताई है। वर्तमान में एससीओ में 10 सदस्य देश शामिल हैं: बेलारूस, चीन, भारत, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और पाकिस्तान। इसके अलावा 15 डायलॉग पार्टनर और 2 ऑब्जर्वर देश भी इस संगठन का हिस्सा हैं।
