अमेरिका में नो हायर नो फायर का दौर: 4.1% बेरोजगारी के बावजूद नौकरी मिलना क्यों हुआ मुश्किल?

अमेरिका में बेरोजगारी दर 4.1 प्रतिशत होने के बावजूद नई नौकरियां मिलना चुनौतीपूर्ण हो गया है। कंपनियां न तो नई भर्तियां कर रही हैं और न ही बड़े पैमाने पर छंटनी, जिसे विशेषज्ञ नो हायर नो फायर का दौर कह रहे हैं।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था वर्तमान में अर्थशास्त्रियों और नौकरी चाहने वालों के लिए एक अजीब पहेली पेश कर रही है। 1 प्रतिशत पर स्थिर है, जो ऐतिहासिक रूप से एक स्वस्थ श्रम बाजार का संकेत देती है, लेकिन नए अवसरों की तलाश करने वालों के लिए जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। बड़े पैमाने पर छंटनी की कमी के बावजूद, एक नया पद सुरक्षित करना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है और जो लोग नौकरी की तलाश में हैं, वे महीनों तक इंटरव्यू देते रहते हैं, लेकिन ऑफर लेटर आने का नाम नहीं ले रहा है। अर्थशास्त्रियों ने इस अजीब हालात को नो हायर, नो फायर यानी न भर्ती, न छंटनी का नाम दिया है। यह एक ऐसे स्थिर परिदृश्य का वर्णन करता है जहां कंपनियां न तो अपने कार्यबल का विस्तार कर रही हैं और न ही इसमें बड़ी कटौती कर रही हैं, जिससे नौकरी चाहने वाले अधर में लटके हुए हैं।

पेरोल आंकड़ों में बड़ा बदलाव

इस सुस्ती के सबसे बड़े संकेत खुद पेरोल यानी कंपनियों की वेतनसूची के आंकड़ों में छिपे हैं। साल 2026 में अब तक अमेरिकी कंपनियों ने हर महीने औसतन करीब 61000 नौकरियां जोड़ी हैं। यह आंकड़ा 2023-2024 के दौरान दर्ज की गई करीब 166000 मासिक नौकरियों के औसत की तुलना में काफी कम है। हालात तब और गंभीर नजर आए जब जुलाई 2026 के आंकड़े सामने आए। अमेरिकी कंपनियों ने कुल मिलाकर करीब 23000 नौकरियां घटा दीं। 1 प्रतिशत रही। यह दर्शाता है कि सिर्फ भर्ती धीमी नहीं हुई है, बल्कि कुछ महीनों में नौकरियों की कुल संख्या में सीधी कमी भी दर्ज की गई है।

इंडीड हायरिंग लैब की रिपोर्ट के खुलासे

4 प्रतिशत रही। 1 प्रतिशत दर्ज की गई। ये तीनों ही आंकड़े काफी दबे हुए हैं, जो एक ठहरे हुए बाजार की ओर इशारा करते हैं। जॉब पोस्टिंग इंडेक्स भी महामारी से पहले के स्तर के आसपास ही ठहरा हुआ है। जानकारों का कहना है कि यह सुस्ती किसी एक महीने की बात नहीं है, बल्कि पिछले करीब डेढ़ साल से चले आ रही एक बड़ी ट्रेंड का हिस्सा है, जिसमें भर्ती की रफ्तार धीरे-धीरे और सुस्त होती चली गई है।

कंपनियां नई भर्ती से क्यों बच रही हैं?

इस सुस्ती के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी वजह आर्थिक अनिश्चितता है, जिसके कारण कंपनियों के पास भविष्य को लेकर कोई साफ तस्वीर नहीं है। ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है और आगे की प्लानिंग करना मुश्किल कर दिया है। इसके अलावा तेल की ऊंची कीमतों और दुनिया में बढ़ते तनाव ने भी कारोबार की लागत पर दबाव डाला है। जब भविष्य को लेकर स्पष्टता नहीं होती, तो कंपनियां नए कर्मचारियों पर खर्च बढ़ाने के बजाय फिलहाल इंतजार करने का रास्ता चुनती हैं।

इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का असर भी अब साफ दिखने लगा है। कई कंपनियां ऐसे कामों के लिए, जो पहले नए कर्मचारियों से करवाए जाते थे, अब एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रही हैं और इससे कुछ तरह की नौकरियों में नई भर्ती की जरूरत घट गई है। पेरोल फर्म एडीपी (ADP) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में निजी क्षेत्र में सिर्फ 44000 नौकरियां जुड़ीं। वहीं, नौकरी बदलने वालों की सैलरी ग्रोथ करीब 7 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो करीब एक साल में सबसे तेज रफ्तार रही। यानी जो कुशल लोग नौकरी बदल पा रहे हैं, उन्हें अच्छा पैसा मिल रहा है, लेकिन नई एंट्री बेहद सीमित हो गई है।

छंटनी न होने के पीछे का तर्क

यह सवाल इस पूरी पहेली का सबसे दिलचस्प हिस्सा है कि अगर भर्ती इतनी धीमी है, तो कंपनियां कर्मचारियों को निकाल क्यों नहीं रहीं? इसका जवाब कोरोना महामारी के बाद के अनुभव में छिपा है। उस दौर में जब मांग अचानक बढ़ी थी, तो जिन कंपनियों ने बड़े पैमाने पर छंटनी की थी, उन्हें दोबारा भर्ती करने में काफी मुश्किल और खर्च झेलना पड़ा था। इस अनुभव से सीख लेते हुए अब कंपनियां जोखिम नहीं लेना चाहतीं। इसके बजाय वे भर्ती पर रोक, काम के घंटों में कटौती और अस्थायी स्टाफ में कमी जैसे छोटे कदमों से काम चला रही हैं। साप्ताहिक बेरोजगारी दावे भी 2026 में ज्यादातर समय 200000 के आसपास ही बने रहे हैं, जो बताता है कि छंटनी का माहौल फिलहाल ज्यादा तेज नहीं है।

नौकरी तलाशने वालों पर प्रभाव

इस पूरे हालात का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो नई नौकरी की तलाश में हैं, खासकर फ्रेशर्स और करियर बदलने की सोच रहे लोगों पर। भले ही हेडलाइन बेरोजगारी दर कम दिखे, लेकिन जब भर्तियां ही सीमित हों, तो नौकरी खोजने में लगने वाला समय बढ़ जाता है। 5 प्रतिशत थी। इंडीड हायरिंग लैब के विश्लेषकों का कहना है कि यह ठहराव जल्दी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि कंपनियां टैरिफ, महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता के बीच हर नई भर्ती को बहुत सोच-समझकर देख रही हैं।