पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आगामी 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हालात बेहद विस्फोटक और तनावपूर्ण हो गए हैं। जनरल मुनीर की सेना द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई हिंसक कार्रवाई ने क्षेत्र में डर और गुस्से का माहौल पैदा कर दिया है। स्थानीय लोगों और सुरक्षा बलों के बीच जारी इस टकराव में अब तक कई लोगों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
रावलकोट और सुधनोती के बीच खूनी संघर्ष
पीओके में चुनाव विरोधी आंदोलन के दौरान रावलकोट और सुधनोती के बीच के इलाके में सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर सीधी फायरिंग किए जाने का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर किए गए दावों के अनुसार, सेना की इस बर्बर कार्रवाई में 8 प्रदर्शनकारियों की जान चली गई है। इस घटना में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं, जिन्हें उपचार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हालांकि, क्षेत्र में कड़े प्रतिबंधों के कारण इन 8 मौतों के दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना फिलहाल संभव नहीं हो पाया है, लेकिन स्थानीय सूत्रों ने इसे एक बड़ा नरसंहार करार दिया है।
बताया जा रहा है कि प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में मुजफ्फराबाद कूच करने के लिए एकत्र हुए थे और जब यह भीड़ रावलकोट बस स्टैंड के पास पहुंची, तो सुरक्षा बलों ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पहले आंसू गैस के गोले छोड़े गए और फिर उन पर गोलियां बरसाई गईं। इस विरोध प्रदर्शन की एक खास बात यह रही कि इसमें महिलाओं ने भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा लिया, जो सरकार और सेना की नीतियों के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज करा रही थीं।
12 आरक्षित सीटों का विवाद और विरोध का कारण
पीओके में पिछले कई हफ्तों से जारी इस आंदोलन की मुख्य जड़ वहां की चुनावी व्यवस्था है। पीओके विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें से 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखी गई हैं जो वास्तव में पीओके में नहीं रहते। ये लोग पाकिस्तान के विभिन्न बड़े शहरों जैसे लाहौर, कराची और रावलपिंडी में निवास करते हैं। आंदोलनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि इस्लामाबाद की सरकार इन 12 सीटों का उपयोग करके पीओके पर अपनी पसंद की कठपुतली सरकार थोप देती है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और वे इस चुनावी ढांचे में तत्काल बदलाव की मांग कर रहे हैं।
36 दिनों से जारी आंदोलन और 80 से अधिक मौतें
पाकिस्तान की सरकार और सेना के खिलाफ लोगों का यह गुस्सा पिछले 36 दिनों से सड़कों पर दिखाई दे रहा है। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठनों ने बेहद चौंकाने वाले दावे किए हैं। उनका कहना है कि पिछले 36 दिनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 80 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत चुकी है। इसके अलावा, सैकड़ों राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया है। प्रशासन पर यह भी आरोप है कि उसने विरोध की आवाज को दबाने के लिए पूरे इलाके में इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को पूरी तरह से ठप्प कर दिया है।
पीओके के नागरिक अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे बिजली और आटे की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि हक मांगने पर उन्हें बदले में गोलियां दी जा रही हैं। मुनीर की फौज की इस बर्बरता का भारत ने भी कड़ा विरोध किया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीओके के लोगों पर हो रहे इन अत्याचारों को तुरंत बंद करने की अपील की है। जैसे-जैसे 27 जुलाई की तारीख नजदीक आ रही है, मुजफ्फराबाद और आसपास के इलाकों में तनाव और अधिक बढ़ता जा रहा है, जिससे शांतिपूर्ण चुनाव की संभावनाएं क्षीण होती दिख रही हैं।
