भारत की ऊर्जा आयात नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है,। जहां दिसंबर 2025 में रूसी तेल पर उसकी निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है। इस बदलाव के परिणामस्वरूप, भारत अब रूसी तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया है, जिसे तुर्किए ने पीछे छोड़ दिया है, जबकि चीन अभी भी शीर्ष स्थान पर कायम है। यह स्थिति भारत के लिए एक रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन का संकेत देती है, खासकर जब वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ रहे हैं।
रूसी तेल पर भारत की बदलती निर्भरता
दिसंबर 2025 में भारत रूसी तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया है, जो पहले दूसरे स्थान पर था। तुर्किए ने भारत को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया है, जबकि चीन पहले पायदान पर बरकरार है। यह बदलाव रिलायंस इंडस्ट्री्स और सरकारी रिफाइनरियों द्वारा कच्चे तेल की खरीद में भारी कटौती के कारण हुआ है। भारत की यह चाल वैश्विक ऊर्जा बाजार में उसकी स्थिति और रणनीतिक विकल्पों को दर्शाती है, जहां वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
भारत के लिए रूसी तेल का ऐतिहासिक महत्व
साल 2022 से 2025 तक, रूसी तेल ने भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया था, तब भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात करके इसे एक अवसर में बदल दिया। भारत ने इस तेल को रिफाइन करके कई देशों को बेचा, जिससे अरबों डॉलर की कमाई हुई और वह रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया था। यह अवधि भारत के लिए एक आर्थिक लाभ का समय था, जिसने। उसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया।
अमेरिकी दबाव और टैरिफ का प्रभाव
हाल के महीनों में परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आया है और अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने पर 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इसके अलावा, अमेरिका एक ऐसा बिल पास करने की तैयारी में है, जिससे पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर 500 फीसदी तक का टैरिफ लगा सकते हैं। इन संभावित और मौजूदा आर्थिक दबावों के कारण भारत ने रूसी तेल की आपूर्ति में कमी की है। यह अमेरिकी नीति का सीधा परिणाम है, जिसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा निर्यात क्षमता को सीमित करना है।
CREA रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
यूरोपीय थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि दिसंबर 2025 में भारत रूसी कच्चे तेल के खरीदारों में तीसरे स्थान पर खिसक गया। CREA के अनुसार, दिसंबर में भारत का कुल रूसी हाइड्रोकार्बन आयात 2. 3 अरब यूरो रहा, जो नवंबर के 3. 3 अरब यूरो से काफी कम है और यह गिरावट मुख्य रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज और सरकारी स्वामित्व वाली रिफाइनरियों द्वारा कच्चे तेल के आयात में भारी कमी के कारण हुई है। यह रिपोर्ट भारत की ऊर्जा आयात रणनीतियों में आए बदलावों पर प्रकाश डालती है।
तुर्किए का उदय और चीन का वर्चस्व
CREA की रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में 2. 6 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन की खरीद के साथ तुर्किए भारत को पीछे छोड़कर दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया। वहीं, चीन अभी भी शीर्ष खरीदार बना हुआ है, जिसने रूस। के निर्यात राजस्व का 48 फीसदी (6 अरब यूरो) हिस्सा खरीदा। चीन की खरीद में कच्चे तेल की हिस्सेदारी 60 फीसदी (3. 6 अरब यूरो) थी, जिसके बाद कोयला और पाइपलाइन गैस का स्थान रहा। यह दर्शाता है कि चीन रूस के लिए एक स्थिर और महत्वपूर्ण ऊर्जा भागीदार बना हुआ है, जबकि अन्य देशों की स्थिति बदल रही है।
भारत के आयात में गिरावट का विश्लेषण
दिसंबर में भारत द्वारा आयात किए गए 2. 3 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन में कच्चे तेल का हिस्सा 78 फीसदी (1. 8 अरब यूरो) था, जबकि कोयला (424 मिलियन यूरो) और तेल उत्पाद (82 मिलियन यूरो) शेष थे। नवंबर में, भारत ने रूसी कच्चे तेल पर 2. 6 अरब यूरो खर्च किए थे। CREA ने बताया कि भारत के रूसी कच्चे तेल के आयात में महीने-दर-महीने 29 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो प्राइस कैप पॉलिसी लागू होने के बाद से सबसे कम है और कुल आयात में मामूली वृद्धि के बावजूद यह गिरावट आई है, जो भारत की खरीद प्राथमिकताओं में बदलाव को इंगित करती है।
प्रमुख रिफाइनरियों द्वारा खरीद में कमी
इस गिरावट का मुख्य कारण रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी है, जिसने दिसंबर में रूस से अपना आयात आधा कर दिया। CREA ने बताया कि उनका पूरा आयात रोसनेफ्ट द्वारा किया गया था, हालांकि यह माल अमेरिकी विदेश संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) के प्रतिबंध लागू होने से पहले खरीदा गया था। सरकारी स्वामित्व वाली रिफाइनरियों ने भी दिसंबर में रूसी खरीद में 15 फीसदी की कमी की और यह दर्शाता है कि निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में रूसी तेल की खरीद में कमी आई है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का गहरा प्रभाव
अमेरिका ने रूस के दो सबसे बड़े तेल उत्पादक, रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के चलते रिलायंस, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल), एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड जैसी कंपनियों ने अस्थायी रूप से आयात रोक दिया है या कम कर दिया है और हालांकि, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) अभी भी गैर-प्रतिबंधित रूसी संस्थाओं से तेल की खरीद जारी रखे हुए है। यह स्थिति भारतीय कंपनियों के लिए एक जटिल परिचालन वातावरण बनाती है।
भारत का पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर लौटना
जानकारों का कहना है कि भारत ने अब रूस की जगह एक बार फिर से अपने पुराने आपूर्तिकर्ताओं, विशेषकर मिडिल ईस्ट के देशों की ओर रुख किया है और साथ ही, अमेरिकी तेल की खरीदारी में भी इजाफा हुआ है, जिसकी वजह से रूसी तेल की आपूर्ति में कमी देखने को मिली है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जहां वह अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविधतापूर्ण बनाने और भू-राजनीतिक जोखिमों को कम करने का प्रयास कर रहा है।
रूसी तेल से रिफाइंड उत्पादों का निर्यात
CREA ने रूसी कच्चे तेल को प्रोसेस करने वाली रिफाइनरियों से निर्यात प्रवाह पर भी प्रकाश डाला। दिसंबर में, भारत, तुर्किए और ब्रुनेई में रूसी कच्चे तेल का उपयोग करने वाली पांच रिफाइनरियों। ने प्रतिबंध लगाने वाले देशों को 943 मिलियन यूरो मूल्य के तेल उत्पादों का निर्यात किया। इसमें यूरोपीय यूनियन (436 मिलियन यूरो), अमेरिका (189 मिलियन यूरो), ब्रिटेन (34 मिलियन यूरो) और ऑस्ट्रेलिया (283 मिलियन यूरो) जैसे आयातक शामिल थे। अनुमानित 274 मिलियन यूरो मूल्य के ये उत्पाद रूसी कच्चे तेल से रिफाइंड किए गए थे, जो वैश्विक बाजार में रूसी तेल के अप्रत्यक्ष प्रवाह को दर्शाता है।
निर्यात प्रवाह में क्षेत्रीय भिन्नताएं
प्रतिबंध लगाने वाले देशों को निर्यात में महीने-दर-महीने 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जिसमें यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन का योगदान सबसे अधिक रहा, जहां मासिक गिरावट क्रमशः 26 फीसदी और 53 फीसदी रही। इसके विपरीत, ऑस्ट्रेलिया को निर्यात (284 मिलियन यूरो) में 9 फीसदी की वृद्धि हुई, जिसमें भारत की जामनगर रिफाइनरी (132 मिलियन यूरो) और ब्रुनेई की हेंगयी रिफाइनरी (116 मिलियन यूरो) का योगदान सबसे अधिक रहा। जामनगर और तुप्रास अलीगा रिफाइनरियों से अमेरिका को निर्यात में 121 फीसदी की वृद्धि हुई और यह 189 मिलियन यूरो तक पहुंच गया। यह जटिल व्यापार पैटर्न वैश्विक ऊर्जा बाजारों की अंतर-निर्भरता को उजागर करता है।
चीन का बढ़ता आयात
वहीं दूसरी ओर चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना रहा, जिसने शीर्ष पांच आयातकों के कुल राजस्व का 48 फीसदी (6 अरब यूरो) हिस्सा खरीदा। कच्चे तेल की खरीद में 60 फीसदी (3. 6 अरब यूरो) की हिस्सेदारी रही, इसके बाद कोयला और पाइपलाइन गैस का स्थान रहा। समुद्री मार्ग से कच्चे तेल का आयात महीने-दर-महीने 23 प्रतिशत बढ़ा, जिसका मुख्य कारण ईएसपीओ-ग्रेड कच्चे तेल की अधिक आवक थी, जबकि यूराल्स-ग्रेड कच्चे तेल का आयात 15 फीसदी बढ़ा, जो 2023 की दूसरी तिमाही के बाद से चौथी तिमाही के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। यह दर्शाता है कि चीन अभी भी रूस के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा। भागीदार बना हुआ है और उसकी खरीद में लगातार वृद्धि हो रही है।