शेयर सस्ते फिर भी क्यों दूर भाग रहे विदेशी निवेशक बाजार का असली पेंच, जानें मुख्य अपडेट

JM फाइनेंशियल की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से चौसठ अरब डॉलर निकाले हैं जिसके पीछे मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतें हैं.

हाल ही में आई जेएम फाइनेंशियल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय शेयर बाजार में वैल्यूएशन कम होने और शेयर सस्ते होने के बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की तरफ से लगातार दूरी बनाए रखने का सिलसिला जारी है। पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से लगभग चौसठ अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि बाहर निकाली है। इस स्थिति ने निवेशकों और बाजार के जानकारों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतने आकर्षक वैल्यूएशन और बेहतर कमाई के मौकों के बाद भी विदेशी फंड्स भारतीय बाजार में वापसी क्यों नहीं कर रहे हैं। इस पूरी रिपोर्ट में इस बात का गहराई से विश्लेषण किया गया है कि इसके पीछे कौन से मुख्य मैक्रोइकॉनॉमिक और अंतरराष्ट्रीय कारण जिम्मेदार हैं।

दो साल में चौसठ अरब डॉलर की रिकॉर्ड बिकवाली

सितंबर 2026 तक के चौबीस महीनों के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों ने कुल उनसठ अरब 20 करोड़ डॉलर की बिकवाली की थी। इसके बाद अक्टूबर के महीने में लगभग पांच अरब डॉलर का अतिरिक्त आउटफ्लो देखने को मिला, जिससे यह कुल निकासी बढ़कर लगभग चौसठ अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच पिछले दो दशकों के वित्तीय आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह बात साफ सामने आती है कि यह अब तक की सबसे लंबी और सबसे बड़ी बिकवाली का दौर है। अगर वित्तीय वर्षों के हिसाब से देखें तो विदेशी निवेशकों ने वित्त वर्ष 2025 में चौदह अरब 90 करोड़ डॉलर, वित्त वर्ष 2026 में इक्कीस अरब 90 करोड़ डॉलर और वित्त वर्ष 2027 में अक्टूबर महीने की बिकवाली को मिलाकर सत्रह अरब 70 करोड़ डॉलर के शेयर भारतीय बाजारों से बेचे हैं। इतनी बड़ी मात्रा में पूंजी का बाहर जाना इस बात का संकेत है कि केवल सस्ते शेयर और कम वैल्यूएशन विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतें और एफआईआई का मोहभंग

जेएम फाइनेंशियल की रिपोर्ट में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि विदेशी निवेश के प्रवाह यानी एफआईआई फ्लो के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमत एक बेहद अहम और निर्णायक पैमाना बनी हुई है। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो जब भी ब्रेंट क्रूड की कीमत एक सौ पांच डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही है, तब-तब विदेशी निवेशकों ने लगातार बिकवाली का रुख अपनाया है। इसके विपरीत, जब कच्चे तेल की कीमत नब्बे डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती है, तब बाजार में बिकवाली का दबाव कम होने लगता है। अक्टूबर के आखिरी दौर में ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग एक सौ पंद्रह डॉलर प्रति बैरल के आसपास दर्ज की गई थी, जो उस सुरक्षित स्तर से काफी ऊपर है जहां विदेशी पूंजी की बड़ी मात्रा में दोबारा वापसी की उम्मीद की जा सके। पिछले बीस वर्षों के दौरान ब्रेंट क्रूड और एफआईआई निवेश के बीच का यह संबंध और भी अधिक गहरा और महत्वपूर्ण हो गया है।

सस्ता निफ्टी और वैल्यूएशन का असर

भारतीय शेयर बाजार का बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी का एक साल का फॉरवर्ड प्राइस टू अर्निंग्स यानी पीई मल्टीपल गिरकर सत्रह दशमलव एक गुना पर आ गया है, जिसका सीधा मतलब यह है कि वर्तमान में अर्निंग्स यील्ड बढ़कर पांच दशमलव आठ प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा सितंबर 2024 में दर्ज किए गए चौबीस दशमलव आठ गुना मल्टीपल से काफी कम है, उस समय अर्निंग्स यील्ड केवल चार प्रतिशत के आसपास थी। जेएम फाइनेंशियल के विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि हालांकि वैल्यूएशन बाजार के लिए मायने जरूर रखते हैं, लेकिन इनका प्रभाव तुरंत नजर नहीं आता बल्कि यह कुछ समय बाद अपना असर दिखाते हैं। किसी भी महीने की अर्निंग्स यील्ड का उसी महीने होने वाले एफआईआई फ्लो के साथ बहुत कम संबंध देखा जाता है, लेकिन इसके ठीक चार से पांच महीने बाद होने वाले निवेश प्रवाह के साथ इसका एक मजबूत सकारात्मक कोरिलेशन यानी संबंध स्थापित होता है। साल 2021 के बाद से यह संबंध और भी ज्यादा मजबूत हुआ है। ऐतिहासिक रूप से जब भी निफ्टी अपनी फॉरवर्ड अर्निंग्स के पंद्रह से अठारह गुना के दायरे में ट्रेड करता है, तो उसके बाद के बारह महीनों के दौरान औसतन चौदह अरब 10 करोड़ डॉलर का शुद्ध निवेश भारतीय बाजारों में आता है।

आर्थिक वृद्धि और कंपनियों की कमाई का हाल

दिलचस्प बात यह है कि भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि भी एफआईआई के इस बड़े पैमाने पर हो रहे आउटफ्लो को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में साल-दर-साल आधार पर सात दशमलव आठ प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई थी, लेकिन विडंबना यह रही कि इसी समान अवधि के दौरान विदेशी निवेशकों ने तेरह अरब 40 करोड़ डॉलर के शेयर बेचकर अपनी पूंजी बाहर निकाल ली। रिपोर्ट में दिए गए पुराने और ऐतिहासिक उदाहरण इस अंतर को और भी अधिक साफ तौर पर दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, जून 2020 के महीने में भारत की जीडीपी में तेईस दशमलव एक प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई थी, इसके बावजूद एफआईआई ने चार अरब 20 करोड़ डॉलर की भारी खरीदारी भारतीय बाजार में की थी। इसके विपरीत, मार्च 2026 में जब जीडीपी में आठ दशमलव छह प्रतिशत की मजबूत वृद्धि हुई, तब भी विदेशी निवेशकों ने पंद्रह अरब 80 करोड़ डॉलर की भारी बिकवाली की, जो इस पूरे डेटासेट में किसी भी एक तिमाही का अब तक का सबसे बड़ा आउटफ्लो रिकॉर्ड किया गया है।

मुनाफे में सुधार के बावजूद तुरंत नहीं बदलता ट्रेंड

भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों की कमाई और मुनाफे में भी लगातार सुधार देखने को मिल रहा है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के दौरान निफ्टी पचास की प्रॉफिट ग्रोथ साल-दर-साल के आधार पर बारह दशमलव नौ प्रतिशत रही, जबकि जेएम फाइनेंशियल को चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के दौरान बीस दशमलव छह प्रतिशत की दमदार ग्रोथ हासिल होने की पूरी उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म का यह भी अनुमान है कि पूरे वित्त वर्ष 2027 के दौरान अर्निंग्स ग्रोथ चौदह दशमलव दो प्रतिशत और वित्त वर्ष 2028 के दौरान यह बढ़कर सत्रह दशमलव नौ प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। हालांकि, कंपनियों की इस मजबूत अर्निंग्स ग्रोथ का एफआईआई फ्लो के साथ केवल एक मामूली सकारात्मक संबंध ही देखा गया है। बेहतर मुनाफा कमाने की क्षमता और शानदार नतीजे बाजार के वैल्यूएशन को बेशक आकर्षक और मुफीद बना सकते हैं, लेकिन केवल इस एक कारक के दम पर तुरंत निवेश का रुख या ट्रेंड नहीं बदला जा सकता है।

तेल के दाम और मैक्रोइकॉनॉमिक जोखिम

पिछले बीस सालों के आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि साल 2016 के बाद से कुल सात ऐसे महीने आए हैं जब ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत एक सौ पांच डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े से ऊपर दर्ज की गई थी। इनमें से छह महीने ऐसे थे जिनमें विदेशी निवेशकों ने बिकवाली का रास्ता अपनाया और इस दौरान औसतन चार अरब 10 करोड़ डॉलर की पूंजी भारतीय बाजार से बाहर चली गई। इसकी तुलना में जब भी ब्रेंट क्रूड की कीमत पचहत्तर डॉलर प्रति बैरल से कम रही, तब हर महीने औसतन सात सौ मिलियन से नौ सौ मिलियन डॉलर का ताजा निवेश भारत में आया और साल 2021 के बाद से यह देखा गया है कि जब भी ब्रेंट क्रूड की कीमतों में दस प्रतिशत की गिरावट आती है, तो उसी महीने लगभग डेढ़ अरब डॉलर का अतिरिक्त एफआईआई निवेश भारतीय इक्विटी बाजार में आ जाता है। यही कारण है कि यह रिपोर्ट कच्चे तेल की कीमतों के दो बेहद महत्वपूर्ण स्तरों की स्पष्ट पहचान करती है। बाजार को खतरे के दायरे यानी डेंजर जोन से बाहर निकालने के लिए ब्रेंट क्रूड की कीमत का एक सौ पांच डॉलर प्रति बैरल से नीचे आना अनिवार्य है, जबकि नब्बे डॉलर प्रति बैरल से नीचे की गिरावट इस स्थिति को पूरी तरह संतुलित यानी न्यूट्रल बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा और निर्णायक कदम साबित होगी।

रुपये की चाल और घरेलू निवेशकों का सहारा

आमतौर पर यह माना जाता है कि विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की चाल विदेशी निवेश के प्रवाह को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। लेकिन जेएम फाइनेंशियल के गहन विश्लेषण से यह एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि असल में मामला इसके बिल्कुल विपरीत है। पिछले एफआईआई निवेश के आंकड़ों के आधार पर आने वाले अगले महीने में रुपये की चाल का सटीक अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है, लेकिन रुपये में पहले से हो चुके बदलावों के आधार पर एफआईआई निवेश का सही अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं होता है। विश्लेषकों ने अपनी रिपोर्ट में बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि रुपया केवल एक थर्मामीटर की तरह काम करता है, न कि किसी ऐसे लीवर की तरह जो पूरी बाजार प्रक्रिया या विदेशी निवेश को अपनी तरफ से कंट्रोल कर सके। दूसरी तरफ, इतनी भारी मात्रा में एफआईआई की बिकवाली होने के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में किसी भी तरह की बड़ी या विनाशकारी गिरावट देखने को नहीं मिली है। इसकी मुख्य वजह यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने विदेशी निवेशकों द्वारा की गई इस भारी बिकवाली का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने कंधों पर संभाल लिया है और पिछले बारह महीनों के दौरान घरेलू निवेशकों ने कुल इक्यानवे अरब 70 करोड़ डॉलर की भारी खरीदारी भारतीय बाजार में की है, जिसमें अकेले म्यूचुअल फंड्स द्वारा की गई तरेपन अरब 40 करोड़ डॉलर की खरीदारी भी शामिल है। इसी समान अवधि के दौरान सेकेंडरी मार्केट में विदेशी निवेशकों ने उनतालीस अरब डॉलर के शेयर बेचे हैं। मार्च 2026 के बाद से घरेलू संस्थागत निवेशकों ने छप्पन अरब 30 करोड़ डॉलर के शेयर खरीदे हैं, जबकि इसी अवधि के दौरान सेकेंडरी मार्केट में एफआईआई ने बत्तीस अरब डॉलर की बिकवाली की है। आंकड़ों के अनुसार मार्च 2016 में कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी उन्नीस दशमलव नौ प्रतिशत हुआ करती थी, जो घटकर जून 2026 में मात्र चौदह दशमलव दो प्रतिशत पर आ गई है। इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई की हिस्सेदारी ग्यारह दशमलव तीन प्रतिशत से तेजी से बढ़कर अठारह दशमलव नौ प्रतिशत पर पहुंच गई और दिसंबर 2024 में इसने विदेशी निवेशकों को पीछे छोड़ दिया। हालांकि इस मजबूत घरेलू खरीदारी ने भारतीय बाजार को जबरदस्त और लगातार सहारा दिया है, लेकिन इसने विदेशी भागीदारी में किसी भी प्रकार के व्यापक या स्थायी सुधार लाने का काम नहीं किया है।

विदेशी निवेशकों की वापसी को लेकर क्या है संभावना

जेएम फाइनेंशियल के बेस केस परिदृश्य के अनुसार, इस बात की पैंतालीस प्रतिशत संभावना है कि आने वाले समय में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत एक सौ डॉलर से एक सौ पंद्रह डॉलर प्रति बैरल के दायरे के बीच ही बनी रहेगी। इस खास स्थिति में, हालांकि घरेलू वैल्यूएशन बाजार को पूरा सपोर्ट प्रदान करेंगे, लेकिन तेल की ऊंची कीमतें बाजार की इस तेजी को एक सीमित दायरे में बांधकर रखेंगी। ऐसी परिस्थितियों में जनवरी से मार्च 2027 के दौरान यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत में पहली बार लगातार तीन महीनों तक शुद्ध इनफ्लो यानी पूंजी का सकारात्मक आना देखने को मिल सकता है। इस संभावित स्थिति में ब्रोकरेज फर्म का यह अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 के दौरान पंद्रह अरब डॉलर से बीस अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2028 के दौरान दस अरब डॉलर से पंद्रह अरब डॉलर तक का ताजा विदेशी निवेश भारतीय बाजारों में आ सकता है। यदि पश्चिम एशिया के अंतरराष्ट्रीय तनाव में कमी आती है, तो यह रिकवरी प्रक्रिया और भी तेजी से सामने आ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2028 के दौरान बीस अरब डॉलर से पच्चीस अरब डॉलर तक का भारी इनफ्लो दर्ज किया जा सकता है। हालांकि, इसके विपरीत यदि पश्चिम एशिया या अन्य मोर्चों पर तनाव और अधिक बढ़ता है, तो यह संभावित रिकवरी टल सकती है और वित्त वर्ष 2028 के दौरान लगभग दस अरब डॉलर का शुद्ध आउटफ्लो दोबारा देखने को मिल सकता है.