फीफा वर्ल्ड कप 2026 के फाइनल मुकाबले में स्पेन ने डिफेंडिंग चैंपियन अर्जेंटीना को हराकर विश्व विजेता का खिताब अपने नाम कर लिया है। खेल के मैदान पर मिली यह जीत अब केवल फुटबॉल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और जियोपॉलिटिक्स का एक बड़ा विषय बन चुकी है। स्पेन की इस शानदार जीत को अमेरिका और इजराइल के लिए एक बड़े कूटनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। इस नतीजे ने वैश्विक मंच पर उन राजनीतिक दरारों को उजागर कर दिया है जो पिछले कुछ समय से स्पेन, अर्जेंटीना, अमेरिका और इजराइल के बीच बनी हुई थीं।
नेतन्याहू का समर्थन और अर्जेंटीना का रुख
इस महामुकाबले से पहले इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुले तौर पर अर्जेंटीना की टीम का समर्थन किया था। नेतन्याहू के इस समर्थन के पीछे गहरे राजनीतिक कारण थे। अर्जेंटीना के वर्तमान राष्ट्रपति जेवियर माइली को इजराइल और अमेरिका का एक कट्टर समर्थक माना जाता है और माइली ने सत्ता में आने के बाद से ही अपनी विदेश नीति को पूरी तरह से इजराइल के पक्ष में झुका दिया है। दूसरी तरफ, स्पेन की सरकार इजराइल की सबसे बड़ी आलोचकों में से एक रही है। हाल ही में स्पेन ने फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश के तौर पर आधिकारिक मान्यता दी है और गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई का कड़ा विरोध किया है। इजराइल चाहता था कि उसका समर्थक देश जीते, लेकिन स्पेन के चैंपियन बनने से नेतन्याहू को मायूसी हाथ लगी है।
ईरान पर हमले का विरोधी रहा है स्पेन
स्पेन की सरकार सिर्फ फिलिस्तीन के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि ईरान के मामले में भी अमेरिका और इजराइल से अलग रुख रखती है और अमेरिका और इजराइल हमेशा से ईरान पर कड़े प्रतिबंध और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई की वकालत करते रहे हैं। लेकिन स्पेन ने हमेशा ईरान पर किसी भी तरह के सैन्य अटैक का कड़ा विरोध किया है और मिडिल ईस्ट में शांति और कूटनीतिक बातचीत पर जोर दिया है। स्पेन का यह स्वतंत्र रवैया अमेरिका को अक्सर चुभता रहा है। फुटबॉल के मैदान पर स्पेन की यह जीत उनकी इसी स्वतंत्र और अलग विचारधारा की मजबूती के रूप में देखी जा रही है, जो पश्चिमी शक्तियों के दबाव में नहीं झुकती।
ट्रंप के जुबानी हमले और ट्रॉफी सौंपने की मजबूरी
यह वर्ल्ड कप अमेरिका की मेजबानी में खेला गया था, जिससे राजनीतिक समीकरण और भी दिलचस्प हो गए। डोनाल्ड ट्रंप अक्सर स्पेन की वामपंथी नीतियों, मध्य-पूर्व पर उनके स्टैंड और नाटो (NATO) बजट को लेकर स्पेन पर जुबानी हमले करते रहे हैं और लेकिन जिस स्पेन की नीतियों को अमेरिका कोसता रहा, उसी स्पेनिश टीम को अमेरिका की धरती पर मेजबान होने के नाते ट्रंप को अपने हाथों से वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी सौंपनी पड़ी। यह तस्वीर अमेरिका के लिए एक अजीब सी असहजता बयां कर रही थी। इसलिए फाइनल मैच सिर्फ दो बेहतरीन फुटबॉल टीमों का मुकाबला नहीं रह गया था, बल्कि यह दो अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रॉक्सी वॉर बन गया था। स्पेन की जीत ने यह साबित कर दिया कि खेल के मैदान पर कूटनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि कौशल और रणनीति मायने रखती है, भले ही वह वैश्विक शक्तियों को रास न आए।
