सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम ने भारत सरकार के उस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जिसके तहत नीट-यूजी परीक्षा के दौरान ऐप पर अस्थाई रोक लगाई गई थी। केंद्र सरकार ने यह कदम परीक्षा की शुचिता बनाए रखने और पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से उठाया था। सरकार का मानना था कि टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग प्रश्नपत्रों के अवैध प्रसार के लिए किया जा सकता है। हालांकि, टेलीग्राम ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब सूचना साझा करने के कई अन्य माध्यम उपलब्ध हैं, तो केवल उसी के प्लेटफॉर्म को निशाना क्यों बनाया गया है।
सीईओ पावेल ड्यूरोव के गंभीर आरोप
टेलीग्राम ऐप के संस्थापक और सीईओ पावेल ड्यूरोव ने इस प्रतिबंध के बीच बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि भारत की प्रमुख टेलीकॉम कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज उनके ऐप की इंटरनेट कनेक्टिविटी में जानबूझकर दखल दे रही है। ड्यूरोव के अनुसार, यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि कई अन्य देशों में भी टेलीग्राम यूजर्स को इसका सामना करना पड़ रहा है। इन आरोपों ने इस कानूनी विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है, जहां अब तकनीकी हस्तक्षेप और सरकारी नियमों के बीच की खींचतान सामने आ रही है।
आईटी एक्ट की धारा 69ए और सरकारी शक्तियां
भारत में किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म या ऐप को ब्लॉक करने की शक्ति सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 से मिलती है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के अनुसार, इस कानून की धारा 69ए सरकार को यह अधिकार देती है कि वह देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किसी भी ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक कर सके। नीट-यूजी परीक्षा के मामले में, जिसमें 22 लाख छात्र शामिल हैं, सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था और धोखाधड़ी रोकने के आधार पर इस शक्ति का प्रयोग किया है। हालांकि, यह कानून स्पष्ट करता है कि इन शक्तियों का उपयोग केवल तय कानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही किया जा सकता है।
ब्लॉकिंग रूल्स 2009 की प्रक्रिया
किसी ऐप को प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया केवल धारा 69ए तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए आईटी रूल्स 2009 का पालन करना अनिवार्य है। आपातकालीन स्थितियों में, जैसे कि दंगा या परीक्षा पेपर लीक का खतरा, सरकार तत्काल अंतरिम आदेश जारी कर सकती है, लेकिन बाद में इसकी कानूनी समीक्षा अनिवार्य होती है।
संवैधानिक अधिकार और अनुपातिकता का सिद्धांत
टेलीग्राम पर प्रतिबंध का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को बोलने और जानकारी साझा करने की आजादी देता है। हालांकि, अनुच्छेद 19(2) के तहत सरकार इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है। यहां 'अनुपातिकता का सिद्धांत' महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसका अर्थ है कि सरकार का कदम खतरे के अनुपात में होना चाहिए और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि क्या कुछ गलत चैनलों के कारण पूरे ऐप को बंद करना सही है? सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में धारा 69ए को वैध तो माना था, लेकिन यह भी कहा था कि सरकार की कार्रवाई मनमानी नहीं होनी चाहिए।
नीट-यूजी परीक्षा और अस्थाई रोक का तर्क
नीट-यूजी परीक्षा में इस वर्ष 22 लाख छात्र शामिल हुए हैं। पेपर लीक की खबरों के बाद परीक्षा दोबारा आयोजित करने का निर्णय लिया गया, जो 21 जून को निर्धारित थी। सरकार ने इसी सुरक्षा के मद्देनजर 22 जून तक टेलीग्राम पर अस्थाई रोक लगाई थी। सरकार की दलील है कि यह कोई स्थाई प्रतिबंध नहीं है, बल्कि परीक्षा के दौरान होने वाली संभावित ठगी और अफवाहों को रोकने का एक सुरक्षात्मक उपाय है। अब यह मामला अदालत में है, जहां सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परख होगी।
