अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब दुनिया भर के विभिन्न देशों के चुनावों में अपने पसंदीदा और वैचारिक रूप से करीब नेताओं का खुलकर समर्थन करने की नीति पर काम कर रहे हैं। वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए सीधे उम्मीदवारों के पक्ष में संदेश जारी करते हैं और उनके प्रमुख चुनावी मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाते हैं। इसी क्रम में उन्होंने हाल ही में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को खुला समर्थन दिया है। इजराइल में आगामी सत्ता संघर्ष और संसदीय चुनावों के बीच ट्रंप की यह घोषणा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा चर्चा का विषय बन गई है। सवाल यह है कि क्या ट्रंप का यह समर्थन नेतन्याहू को चुनाव में फायदा दिला पाएगा और क्या नेतन्याहू के लिए अपनी सत्ता बचाना इस बार बेहद मुश्किल साबित होने वाला है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान अब तक दुनिया के चार अलग-अलग देशों के चुनावों में सीधे दखल देने के मामले सामने आए हैं। इन चारों देशों में ट्रंप ने अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की जीत के लिए हरसंभव कूटनीतिक और सार्वजनिक प्रयास किए, जिसके परिणाम काफी दिलचस्प रहे हैं। आइए जानते हैं कि इन चार देशों—होंडुरास, जापान, हंगरी और कोलंबिया—में ट्रंप के हस्तक्षेप का क्या असर देखने को मिला और वहां की चुनावी परिस्थितियां कैसी थीं।
1. होंडुरास: चुनाव से पहले मदद रोकने की खुली चेतावनी
नवंबर 2025 में होंडुरास में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले थे। चुनाव से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां के रूढ़िवादी उम्मीदवार नसरी असफुरा का खुलकर समर्थन किया था। ट्रंप ने होंडुरास को कड़ी चेतावनी देते हुए यह बयान दिया था कि यदि चुनाव में नसरी असफुरा की जीत नहीं होती है, तो संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका की तरफ से दी जाने वाली आर्थिक मदद में भारी कटौती की जा सकती है। इसके अलावा, ट्रंप ने नसरी असफुरा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी सल्वाडोर नासरल्ला को भी अपने निशाने पर लिया और उनके खिलाफ बयानबाजी की। ट्रंप के इस रुख के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक दूसरे देश के आंतरिक लोकतांत्रिक चुनावों में सीधे दखल देने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए और होंडुरास में मतदान के बाद मतगणना को लेकर भारी विवाद उत्पन्न हुआ और लंबी देरी के बाद 24 दिसंबर 2025 को आधिकारिक तौर पर नसरी असफुरा को चुनाव का विजेता घोषित किया गया।
चुनावी आंकड़ों के अनुसार, नसरी असफुरा को 40 रुपये 27 पैसे प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी सल्वाडोर नासरल्ला को 39 रुपये 53 पैसे प्रतिशत वोट हासिल हुए। यानी ट्रंप के इस चहेते और समर्थित उम्मीदवार ने बेहद मामूली और कम अंतर से इस चुनाव में जीत दर्ज की। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना रहा कि सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थन को ही नसरी असफुरा की इस जीत की एकमात्र वजह या गारंटी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वहां की स्थानीय परिस्थितियां भी चुनाव को प्रभावित कर रही थीं।
2. जापान: साने ताकाइची के समर्थन में ट्रंप का बड़ा संदेश
फरवरी 2026 में जापान में आम चुनाव आयोजित किए जाने थे। इन चुनावों से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची और उनके राजनीतिक गठबंधन के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी। ट्रंप ने अपने संदेश में साने ताकाइची को एक बेहद लोकप्रिय नेता के रूप में पेश किया और जनता को संबोधित करते हुए कहा कि जापान के उज्ज्वल और सुरक्षित भविष्य के लिए इस बार का यह चुनाव अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके बाद 8 फरवरी 2026 को जापान में मतदान संपन्न हुआ, जिसमें साने ताकाइची के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए एक बड़ी और निर्णायक जीत हासिल की। जापानी राजनीति में इस जीत को ट्रंप के समर्थन के अनुकूल माना गया, हालांकि वहां की स्थानीय जनता का मूड भी गठबंधन के पक्ष में था।
3. हंगरी: विक्टर ओरबान को मिला ट्रंप का समर्थन, फिर भी उठानी पड़ी हार
अप्रैल 2026 में हंगरी के प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव होने थे। इस चुनाव में ट्रंप ने हंगरी के तत्कालीन प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान के समर्थन में पूरा जोर लगा दिया था। यहां तक कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी चुनाव से ठीक पहले हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट का दौरा किया था और वहां पहुंचकर ओरबान के पक्ष में आक्रामक बयान दिए थे। उन्होंने हंगरी के मतदाताओं से अपील की थी कि वे विक्टर ओरबान का ही समर्थन करें ताकि दोनों देशों के संबंध मजबूत बने रहें और इन तमाम अमेरिकी प्रयासों और उच्च स्तरीय वार्ताओं के बावजूद विक्टर ओरबान की पार्टी को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा।
हंगरी के इस चुनाव में पीटर माग्यार के नेतृत्व वाली तिस्जा पार्टी ने शानदार सफलता हासिल करते हुए संसद में स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया और राजनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, हंगरी में लंबे समय से चल रहे आर्थिक ठहराव, व्यापक भ्रष्टाचार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंगरी के धीरे-धीरे अलग-थलग पड़ने से आम मतदाताओं में भारी नाराजगी व्याप्त थी। हंगरी का यह परिणाम इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण साबित हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति का खुला समर्थन किसी भी विदेशी नेता की चुनावी जीत की पक्की गारंटी नहीं हो सकता है, यदि स्थानीय जनता अपनी सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हो।
4. कोलंबिया: ट्रंप समर्थित उम्मीदवार अबेलार्डो दे ला एस्प्रिएला की शानदार जीत
जून 2026 में कोलंबिया में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव आयोजित हुए। इस चुनाव में ट्रंप ने कोलंबिया के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अबेलार्डो दे ला एस्प्रिएला का जोरदार समर्थन किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि इस चुनाव का जो भी नतीजा होगा, वह कोलंबिया और संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों के लिए बेहद अहम साबित होगा। चुनाव के दूसरे दौर में अबेलार्डो दे ला एस्प्रिएला ने अपनी जीत दर्ज की। शुरुआती मतगणना के आंकड़ों के अनुसार, उन्हें 49 रुपये 66 पैसे प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी इवान सेपेडा को 48 रुपये 70 पैसे प्रतिशत वोट ही मिल पाए।
कोलंबिया के इस चुनाव में ट्रंप के दखल की वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने कड़ी आलोचना की थी। राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने सार्वजनिक रूप से बयान देते हुए कहा था कि जब एक शक्तिशाली देश किसी अन्य संप्रभु देश के आंतरिक मामलों और चुनावों के फैसलों में इस तरह दखलअंदाजी करता है, तो उस देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता सीधे तौर पर प्रभावित होती है। इसके बावजूद ट्रंप समर्थित उम्मीदवार ने बाजी अपने नाम कर ली।
इजराइल: बेंजामिन नेतन्याहू के लिए ट्रंप का खुला और आक्रामक समर्थन
अब बात करते हैं इजराइल की, जहां 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने तय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 अक्टूबर को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन में एक लंबा और स्पष्ट संदेश जारी किया। ट्रंप ने नेतन्याहू की तारीफ करते हुए उन्हें एक बेहद मजबूत, साहसी और अडिग नेता बताया और कहा कि वे अत्यधिक कठिन और संकटपूर्ण हालातों में भी डटे रहे हैं। ट्रंप ने इजराइल की आम जनता को सीधे तौर पर संबोधित करते हुए बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए अपना पूर्ण समर्थन और आशीर्वाद जताया।
अपने इस समर्थन संदेश में ट्रंप ने ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई का विशेष रूप से जिक्र किया और उन्होंने इजराइल की जनता को चेतावनी भरे लहजे में यह भी कहा कि यदि इजराइल के मतदाता किसी दूसरे नेता को चुनकर सत्ता में लाते हैं, तो अमेरिका को अपने स्तर पर यह जोखिम भरा काम खुद करना पड़ सकता है। इजराइल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने हैं, और वहां की राजनीतिक व्यवस्था के अनुसार मतदाता सीधे तौर पर प्रधानमंत्री पद के लिए वोट नहीं डालते हैं। इसके बजाय, वे संसद की कुल 120 सीटों के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं।
इजराइल की संसद में किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े के रूप में कम से कम 61 सीटों की आवश्यकता होती है। चुनाव से ठीक पहले आए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों और ओपिनियन पोल्स में बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन अपने मुख्य विपक्ष से कुछ पीछे दिखाई दे रहा था, लेकिन किसी भी राजनीतिक पक्ष को चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने की कोई खास संभावना नहीं बताई जा रही थी और ऐसे में यह सवाल और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्या ट्रंप का यह खुला समर्थन नेतन्याहू को चुनाव में जीत की सीढ़ी तक पहुंचा सकता है।
क्या ट्रंप का समर्थन नेतन्याहू को इजराइल में दिला पाएगा जीत?
इस अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मामलों और राजनीतिक विशेषज्ञों की राय पूरी तरह से बंटी हुई नजर आ रही है। इजराइल की प्रसिद्ध बार-इलान यूनिवर्सिटी की पॉलिटिकल स्टडीज की जानी-मानी एक्सपर्ट इलाना श्पाइजमैन का यह मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इस समर्थन से इजरायली मतदाताओं की बुनियादी राजनीतिक राय या सोच में किसी बड़े बदलाव की कोई संभावना नहीं है। उनके अनुसार, नेतन्याहू के जो कट्टर समर्थक हैं, वे पहले से ही ट्रंप और नेतन्याहू के बीच के गहरे और घनिष्ठ रिश्तों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जबकि नेतन्याहू के कड़े विरोधियों की अपनी अलग और गहरी शिकायतें हैं जो इस समर्थन से बदलने वाली नहीं हैं।
दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू के एक पूर्व राजनीतिक सलाहकार और जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार ने अपनी राय रखते हुए कहा कि ट्रंप का यह सार्वजनिक समर्थन नेतन्याहू के चुनाव प्रचार अभियान को एक नई और भारी ऊर्जा प्रदान कर सकता है। हालांकि, 'टाइम्स ऑफ इजराइल' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इजराइल डेमोक्रेसी Institute के द्वारा कराए गए एक सर्वे में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि देश की सुरक्षा के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर इजरायली नागरिकों का भरोसा लगभग 70 प्रतिशत से भारी गिरावट के साथ केवल 42 प्रतिशत पर सिमट कर रह गया है।
यह बड़ी गिरावट ईरान के साथ हुए सीधे युद्ध और उसके बाद की परिस्थितियों के चलते दर्ज की गई है। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप का यह समर्थन नेतन्याहू के पुराने और समर्पित समर्थकों को तो अत्यधिक उत्साहित कर सकता है, लेकिन यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि इससे नए और तटस्थ मतदाता भी बड़ी संख्या में उनके पक्ष में मतदान करने के लिए आकर्षित हो जाएं।
הנשיא טראמפ: "לעם ישראל הגדול: בנימין נתניהו היה ראש ממשלה לוחם דגול, ושותף גדול עוד יותר לשלום במאבק נגד הרפובליקה האסלאמית של אירן, עם הקריאה שלה בת ה-51 שנה: 'מוות לישראל, מוות לאמריקה! נשמיד את השטן הקטן ואת השטן הגדול'. איזו מדינה יכולה לשרוד כאשר מאפשרים להשמיע אמירות כאלה, שהרי בסופו של דבר הן תמיד מתגשמות? זו הייתה רק שאלה של זמן עד שאירן הייתה מוציאה לפועל את הסיסמה המאיימת הזאת. אולם היא הושמדה באופן שיטתי, הן מבחינה צבאית והן מבחינה כלכלית, ואם לא תשנה את דרכיה במהירות, בקרוב נשלים את המלאכה. אם לישראל יהיה מנהיג שגוי, כלומר כל אדם מלבד ביבי, אמריקה תצטרך לבצע את העבודה הזאת בעצמה, ואין לי נטייה לעשות זאת. בנימין נתניהו היה חזק, אמיץ ומבריק לנוכח התנגדות אדירה, לרבות התנגדות שהגיעה אפילו מתוך ישראל עצמה. למרות כל זאת, הוא החזיק מעמד, ולמעשה אף שגשג! צפיתי בביבי בתקופות הקשות ביותר. גברים ונשים רגילים היו קורסים תחת הלחץ במצבים כאלה - אבל ביבי לא קרס. למעשה, הוא רק התחזק, והוא שומר על אותה עוצמה גם כיום. זהו סוג השותף שארצות הברית של אמריקה דורשת מישראל - מדינה שהיא עשתה למענה רבות כל כך. אנא ראו במכתב זה הבעת תמיכה מלאה ומוחלטת שלי בבנימין נתניהו במירוץ הקרוב שלו לבחירה מחדש לראשות ממשלת ישראל. ביבי נתניהו לעולם לא יאכזב אתכם! תודה על תשומת הלב לעניין זה. דונלד ג’יי. טראמפ נשיא ארצות הברית של אמריקה".
— Benjamin Netanyahu - בנימין נתניהו (@netanyahu) October 18, 2026
