अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने राष्ट्रपति की उन शक्तियों को सीमित कर दिया है, जिसके तहत वह 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट' (IEEPA) का उपयोग कर रातों-रात किसी भी देश पर भारी टैरिफ लगा देते थे। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद अब ट्रंप प्रशासन ने अपनी रणनीति बदलते हुए 1974 के ट्रेड एक्ट के 'सेक्शन 301' को अपना मुख्य हथियार बनाने का निर्णय लिया है। हालांकि, इस नए रास्ते में अब उन्हें किसी भी देश पर टैक्स थोपने से पहले एक लंबी और गहन कानूनी जांच प्रक्रिया से गुजरना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और IEEPA शक्तियों पर अंकुश
डोनाल्ड ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल और वर्तमान नीतियों में अक्सर IEEPA का उपयोग एक राजनीतिक और आर्थिक हथियार के रूप में करते रहे हैं। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार था कि वह किसी भी देश से आने वाले सामान पर 10% से 50% तक का आयात शुल्क तुरंत प्रभाव से लागू कर सकें। इसका उपयोग अक्सर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जाता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब इस 'मनमानी' शक्ति पर रोक लगा दी है और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रोमैन के अनुसार, अब राष्ट्रपति टैरिफ का उपयोग केवल व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रतिशोध के लिए नहीं कर पाएंगे। इस फैसले ने उस 'पॉलिटिकल ब्लैकमेलिंग' के रास्ते को बंद कर दिया है जिसका उपयोग ट्रंप प्रशासन अक्सर विदेशी सरकारों पर दबाव बनाने के लिए करता था।
सेक्शन 122 और 150 दिनों का अस्थायी प्रावधान
अदालत के झटके के बाद ट्रंप प्रशासन ने वैकल्पिक कानूनी रास्तों की तलाश शुरू कर दी है और इसके तहत 'सेक्शन 122' का सहारा लिया गया है। ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके माध्यम से वैश्विक स्तर पर 10% की ड्यूटी लगाई गई है। यह कानून राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह बिना किसी लंबी जांच के अधिकतम 150 दिनों के लिए 15% तक का टैरिफ लगा सकते हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि यह कदम एक अस्थायी व्यवस्था की तरह है। इसका मुख्य उद्देश्य तब तक दबाव बनाए रखना है जब तक कि सरकार 'सेक्शन 301' के तहत स्थायी और कानूनी रूप से मजबूत जांच पूरी नहीं कर लेती।
सेक्शन 301: अनुचित व्यापार के खिलाफ नया 'ब्रह्मास्त्र'
ट्रंप प्रशासन की नई रणनीति के केंद्र में अब 'सेक्शन 301' है। यह कानून राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति देता है जो 'अनुचित व्यापार व्यवहार' में शामिल हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमिसन ग्रीर के अनुसार, उनकी टीम अब कई देशों के खिलाफ नई जांच शुरू करने की तैयारी में है। इन जांचों में फार्मास्युटिकल कंपनियों की दवाओं की कीमतें, औद्योगिक क्षमता से अधिक उत्पादन, जबरन मजदूरी और अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के साथ होने वाले भेदभाव जैसे मुद्दों को आधार बनाया जाएगा और चीन और ब्राजील के खिलाफ पहले से ही इस तरह की जांच चल रही है, और आने वाले समय में वियतनाम और कनाडा जैसे देश भी इस रडार पर आ सकते हैं।
लंबी कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की अनिवार्यता
सेक्शन 301 के तहत टैरिफ लगाना IEEPA की तुलना में अधिक जटिल है। इसके लिए सरकार को एक औपचारिक जांच प्रक्रिया का पालन करना होता है, जिसमें साक्ष्य जुटाना, कानूनी आधार तैयार करना और सार्वजनिक सुनवाई करना शामिल है। इस पूरी प्रक्रिया में अक्सर एक साल या उससे अधिक का समय लग सकता है। इसका अर्थ यह है कि अब ट्रंप प्रशासन मेक्सिको या कनाडा जैसे देशों पर अचानक किसी मुद्दे को लेकर टैरिफ नहीं थोप पाएगा। प्रत्येक टैरिफ के पीछे एक ठोस व्यापारिक और कानूनी तर्क होना अनिवार्य होगा और विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अचानक आने वाले झटकों में कमी आएगी और बाजार में कुछ हद तक स्थिरता और पारदर्शिता बनी रहेगी।
सेक्शन 232 और राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू
सेक्शन 301 के अलावा ट्रंप प्रशासन 'सेक्शन 232' का भी उपयोग कर रहा है। ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट 1962 का यह खंड राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर आयात शुल्क लगाने की अनुमति देता है। वर्तमान में इसका उपयोग ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट्स, भारी ट्रक, तांबा और लकड़ी के उत्पादों जैसे फर्नीचर पर शुल्क लगाने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, सेक्शन 232 की एक सीमा यह है कि यह किसी एक विशिष्ट देश को लक्षित करने के बजाय वैश्विक स्तर पर लागू होता है। इसलिए, विशिष्ट देशों को निशाना बनाने के लिए ट्रंप प्रशासन के पास सेक्शन 301 ही सबसे प्रभावी विकल्प बचा है, जिसे अब पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ लागू किया जाएगा।
