अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में भले ही तेजी देखी जा रही हो, लेकिन भारत के लिए फिलहाल घबराने की कोई बात नहीं है। भारत सरकार की स्मार्ट और डाइवर्सिफाइड तेल खरीद रणनीति की बदौलत देश में तेल सप्लाई की कोई कमी नहीं होगी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलती परिस्थितियों ने पूरी दुनिया की आर्थिक चिंताओं को एक बार फिर से बढ़ा दिया है।
पाबंदियों और हमलों से बिगड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार
सीजफायर खत्म होने और ईरान पर नई पाबंदियों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। हालात तब और बिगड़ गए जब अमेरिका ने ईरान को कच्चे तेल की बिक्री पर मिली अस्थायी छूट को रद्द कर दिया और फिर से सख्त प्रतिबंध लागू कर दिए। इसके अलावा, 80 से ज्यादा ईरानी ठिकानों पर सैन्य हमले भी किए गए। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास क्रूड और एलएनजी टैंकरों पर हुए हमलों ने ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर बड़ा डर पैदा कर दिया है। इसी घबराहट के चलते ब्रेंट क्रूड लगभग 6 प्रतिशत की छलांग लगाकर 78 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है, वहीं अमेरिकी क्रूड भी 74 डॉलर के पार कारोबार कर रहा है।
भारत की रणनीति और सुरक्षित आपूर्ति
इन तमाम वैश्विक चिंताओं के बीच राहत की बात यह है कि भारत इस बार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सुरक्षित स्थिति में है। पीरामल ग्रुप के चीफ इकोनॉमिस्ट देबोपाम चौधरी के मुताबिक, भारत ने कच्चे तेल की खरीद में अपनी रणनीति को काफी डाइवर्सिफाई किया है। अब भारत केवल मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका, वेनेजुएला और रूस जैसे देशों से भी बड़े पैमाने पर तेल मंगा रहा है। एक्सिस डायरेक्ट के कमोडिटी एनालिस्ट देवैया गगलानी का मानना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में दिक्कतें आती भी हैं, तो भारत को सप्लाई का कोई बड़ा संकट नहीं झेलना पड़ेगा और सऊदी अरब ने हाल ही में एशियाई बाजारों के लिए पिछले 20 सालों की सबसे बड़ी कीमत कटौती का ऐलान किया है, जो इस झटके को कम करने में मदद करेगा।
आर्थिक जोखिम और विशेषज्ञों की चेतावनी
तैयारियों के बावजूद एक बड़ा आर्थिक जोखिम बना हुआ है। जानकारों की मानें तो यदि यह टकराव लंबा चला, तो भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत वर्तमान 68 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 75 डॉलर के पार निकल जाएगी। कोटक सिक्योरिटीज के कमोडिटी रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों की आवाजाही अभी भी युद्ध पूर्व स्तरों से 60 से 70 प्रतिशत नीचे है। बाजार ने युद्ध खत्म होने की उम्मीद में दाम 120 डॉलर से घटाकर 70 डॉलर के स्तर पर ला दिए थे, लेकिन अब यह वापस उसी खतरे की ओर बढ़ रहा है।
आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भले ही भारत सीधे तौर पर ईरान से तेल नहीं खरीदता, लेकिन दुनिया भर में दाम बढ़ने का अप्रत्यक्ष नुकसान देश को उठाना पड़ सकता है। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के प्राइम रिसर्च हेड देवर्ष वकील स्पष्ट करते हैं कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ेगा। तेल कंपनियों को कच्चे माल के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे, जिससे रुपये पर दबाव आएगा और चालू खाता घाटा बिगड़ सकता है। इसका सीधा असर देश में महंगाई बढ़ने के रूप में सामने आ सकता है। मोतीलाल ओसवाल के कमोडिटी एनालिस्ट मानव मोदी ने यह भी बताया कि एलएनजी जहाजों पर हमलों के कारण प्राकृतिक गैस के दाम भी ऊपर जा रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें आम आदमी का बजट बिगाड़ सकती हैं।
