E-20 पेट्रोल में मिलावट से वाहन खराब: तेल कंपनियों और कंपनियों के बीच फंसा उपभोक्ता

E-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों में आ रही खराबी पर वाहन निर्माता और तेल कंपनियां आमने-सामने हैं। विशेषज्ञों ने सरकार से इस भ्रम को दूर करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की मांग की है।

मौजूदा समय में वाहन मालिकों के लिए स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो गई है क्योंकि E-20 पेट्रोल को लेकर वाहन निर्माता कंपनियों और तेल कंपनियों के बीच खींचतान जारी है। उपभोक्ता मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ प्रोफेसर बेजॉन मिश्रा ने कहा कि मौजूदा समय में उपभोक्ता की स्थिति बड़ी विकट है। उन्होंने सरकार से इस मामले पर तत्काल कदम उठाने और एथेनॉल मिश्रित ईंधन से जुड़ी हकीकत सामने लाने का आग्रह किया है। मुख्य समस्या यह है कि जब E-20 पेट्रोल के कारण नए वाहनों के खराब होने पर सवाल उठते हैं, तो वाहन निर्माता कंपनियां ईंधन में मिलावट का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं। दूसरी ओर, तेल कंपनियां डिजिटल तकनीक और रियल टाइम निगरानी का दावा करती हैं, जिससे उपभोक्ता को यह समझ नहीं आता कि आखिर मिलावट हो कहां रही है।

मिलावट का दावा और पारदर्शिता का अभाव

उपभोक्ता मामलों के जानकारों का तर्क है कि यदि सरकार और वाहन निर्माता E-20 को मंजूरी दे रहे हैं और फिर भी मिलावट का दावा किया जा रहा है, तो पेट्रोल पंप के अलावा ऐसी कोई जगह नहीं बचती जहां मिलावट संभव हो। सुप्रीम कोर्ट में उपभोक्ता मामलों के वकील सत्यम सिंह के मुताबिक, कुछ साल पहले तक पेट्रोल पंपों में मिलावट और सेवाओं में कमी पर एक वार्षिक रिपोर्ट जारी की जाती थी, जिसे अब बंद कर दिया गया है और अब तेल कंपनियां जीपीएस ट्रैकिंग और ऑनलाइन ऑटोमेशन जैसी तकनीकों के जरिए निगरानी करती हैं और दावा करती हैं कि मिलावट संभव नहीं है। हालांकि, वाहन निर्माताओं ने साफ कर दिया है कि यदि ईंधन मिलावटी पाया गया तो कंपनी वाहन की खराबी के लिए जिम्मेदार नहीं होगी। ऐसे में उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है क्योंकि सरकार का कहना है कि E-20 से इंजन पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता।

ARAI की रिपोर्ट और तकनीकी चुनौतियां

सरकार भले ही E-20 को सुरक्षित बता रही हो, लेकिन एआरएआई की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि वाहन E-20 के अनुकूल नहीं है, तो उसके कुछ प्लास्टिक और रबर के पुर्जे प्रभावित हो सकते हैं। प्रोफेसर बेजॉन मिश्रा ने इस मुद्दे की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि तेल कंपनियों को अपना पक्ष तभी स्पष्ट करना चाहिए था जब वाहन निर्माताओं ने मिलावट का दावा किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उपभोक्ता हर बार पेट्रोल भरवाने से पहले खुद जांच करे या फिर हर छोटी समस्या के लिए उपभोक्ता फोरम और अदालतों के चक्कर लगाए। सुप्रीम कोर्ट के वकील अनुपम मिश्रा ने भी इसे एक गंभीर मुद्दा बताते हुए सरकार से मांग की है कि वह इस भ्रम को दूर करने के लिए कड़े कदम उठाए और व्यवस्था की कमियों को दूर करे।

पेट्रोल पंपों की निगरानी का आधुनिक तंत्र

तेल कंपनियों ने पेट्रोल की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए कई कड़े कदम उठाए हैं। ईंधन ले जाने वाले टैंकरों में जीपीएस लगाया गया है ताकि रास्ते में तेल की चोरी या मिलावट को रोका जा सके। इसके अलावा, पेट्रोल पंपों के टैंकों को ऑनलाइन ऑटोमेशन सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे तेल की मात्रा और स्टॉक में किसी भी तरह की गड़बड़ी की जानकारी तुरंत मिल जाती है और क्वालिटी एश्योरेंस सेल और मोबाइल लैब द्वारा देशभर में पेट्रोल पंपों से रैंडम सैंपल लेकर उनकी जांच की जाती है। साथ ही, हर पेट्रोल पंप पर ईंधन की सघनता यानी डेंसिटी को दर्शाना अनिवार्य है ताकि ग्राहकों को सही जानकारी मिल सके। इन तमाम सुरक्षा उपायों के बावजूद मिलावट के दावों ने उपभोक्ताओं के मन में डर पैदा कर दिया है।

उपभोक्ता के अधिकार और जांच के तरीके

यदि किसी ग्राहक को पेट्रोल में मिलावट या पानी मिले होने का संदेह होता है, तो उनके पास मौके पर ही जांच करने के कानूनी अधिकार हैं। ग्राहक पेट्रोल पंप पर मुफ्त में उपलब्ध फिल्टर पेपर मांगकर पेट्रोल की शुद्धता की तुरंत जांच कर सकते हैं। इसके अलावा, हर पंप पर हाइड्रोमीटर और थर्मामीटर उपलब्ध होना चाहिए, जिससे पेट्रोल के आधिकारिक घनत्व की जांच की जा सकती है। यदि इन जांचों में कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो उपभोक्ता राज्य के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग या संबंधित तेल कंपनी के पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। शिकायत सही पाए जाने पर संबंधित पेट्रोल पंप को सील करने और उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने का प्रावधान है। उपभोक्ताओं को अपने इन अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए ताकि वे धोखाधड़ी से बच सकें।